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सोमवार, जनवरी 6

तम की कारा में दुख झेला

तम की कारा में दुख झेला 


तम की कारा में दुख झेला 

राजस मुक्ति पथ दिखलाता, 

सत ने सत्य  को दिया आश्रय 

लेकिन क्रम पुन: तम का आया !


एक  चक्र में घूम रहे जन 

बार-बार वे गलियाँ आतीं, 

जिनमें दंश कभी पाये थे 

फिर भी कदम वहीं लिए जातीं !


निज भूलों को भाग्य बताकर   

निज करनी से बाज न आते, 

जिस राह  पर मिले थे काँटे 

फिर-फिर उस पर कदम बढ़ाते  !


स्वयं ज्ञान का करें अनादर 

सुख  चाहों  में दौड़े जाते, 

तृष्णा मन की तृप्त न होगी 

अटल सत्य यह फिर बिसराते  !


सतयुग से कलयुग तक पहुँचे  

 अब फिर से ऊपर जाना है, 

थम जाये यह बस सतयुग में 

 इक नया विधान बनाना है !



मंगलवार, दिसंबर 7

संध्या बेला

संध्या  बेला  

तमस की काली रात्रि 
अथवा रजस का उजला दिन 

दोनों रोज ही मिलते हैं 

अंधकार और प्रकाश के 

इस खेल में हम नित्य ही स्वयं को छलते हैं 

चूक जाती है दोनों के 

मिलन की सन्ध्या बेलायें 

जब प्रकाश और तम एक-दूसरे में घुलते हैं 

उस सलेटी आभा में 

सत छिपा रहता है 

पर कभी अँधेरा कभी उजाला 

उसे आवृत किये रहता है 

वही धुधंला सा उजास ही 

उस परम की झलक दिखाता है 

जब मन की झील स्वच्छ हो और थिर भी 

तभी उसमें पूर्ण चंद झलक जाता है 

न प्रमाद न क्रिया जब मन को लुभाती है

तब ही उसकी झलक मिल पाती है  !


शनिवार, जुलाई 8

जादूगर और माया


जादूगर और माया


चला आता उसी तरह दुःख पीछे सुख के
जैसे आदमी के पीछे उसकी छाया
भर दामन में ख़ुशी बाँटने निकले कोई
तो बदल देती है गमों में उसको माया
भरें हर्जाना यदि चाहा सुख कण भर भी
चुकायें कीमत हर आसक्ति हर मोह की
कुछ भी यहाँ मुफ्त नहीं मिलता
बिना एक हुए माटी से कोई बीज नहीं खिलता
जब चाह जगे भीतर सत् को पाने की
तब जाकर ही इस खेल की पहचान होगी
भीतर जाने कौन से गह्वर में रहता है इक जादूगर
जिसे रास नहीं आता तिल भर भी नकार
दिखाता है वही तो आईना बार-बार !


शुक्रवार, सितंबर 9

थामे क्यों तुम तम का छोर


थामे क्यों तुम तम का छोर

छुप छुप कर वह झांक रहा है
हौले हौले कदम उठाता,
होकर भी जो ना होने का
इस दुनिया का भरम निभाता !  

दूर असत् से करो हमें तुम
सत् की चाह जगी है मन में,
सदियों से सुनता यह विनती
सत् देखे ना वह जीवन में !

अंधकार नहीं भाता है
ले चल तू प्रकाश की ओर,
सुन के वह अचरज करता है
थामे क्यों तुम तम का छोर !

मृत्यु नहीं अमरता वर दो
युग-युग से मानव ने गाया,
नित विनाश का खेल चल रहा
नजर नहीं उसको यह आया !

‘जो है केवल वही, वही है
जो नहीं है भ्रम है भारी,
कोमल सी इक मृदु अनुभूति
छवि उसकी सुखद है न्यारी !