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शनिवार, मार्च 11

एक पुकार बुलाती है जो

एक पुकार बुलाती है जो 


कोई कथा अनकही न रहे  

व्यथा कोई अनसुनी न रहे  , 

जिसने कहना-सुनना चाहा 

वाणी उसकी मुखर हो रहे   !


एक प्रश्न जो सोया  भीतर 

एक जश्न भी खोया भीतर, 

जिसने उसे जगाना चाहा 

निद्रा उसकी स्वयं सो रहे    ! 


एक चेतना व्याकुल करती 

एक वेदना आकुल करती,

जिसने उससे बचना चाहा 

पीड़ा उसकी सखी हो रहे ! 


कोई प्यास अनबुझी न रहे  

आस कोई  अनपली न रहे, 

जिसने उसे पोषणा चाहा 

सहज अस्मिता कहीं खो रहे  ! 


एक पुकार बुलाती है जो 

इक झंकार लुभाती है जो, 

जिसने उसको सुनना चाहा 

घुलमिल उससे एक हो रहे  !


गुरुवार, मार्च 9

एक दिन



एक दिन


एक दिन आएगा  
जब सही अर्थों में समान होंगे हम 
परमात्मा की ज्योति से दीप्त 
मनु और शतरूपा की भांति 
एक समान आवश्यक 
उसे जन्माने में 
पंछी के दो परों की भांति 
जीवन के हर द्वंद्व की भांति 
अपरिहार्य एक से 
नहीं होगी कोई प्रतिद्वंद्वता 
न कोई स्पर्धा 
न कोई छोटा और बड़ा 
जीवन के पथ पर संग-संग कदम बढ़ाते 
दो मित्रों की भांति हम लिखेंगे 
भविष्य की नई पीढ़ियों का भाग्य 
निज संस्कारों से पोषित करेंगे 
उनकी अछूती कोमल निष्पाप आत्माएं 
एक दिन आयेगा 
जब हम पुनः मिलेंगे 
समान स्तर पर 
न कोई अनुगामी होगा 
न पीछे चलेगा छाया बनकर 
साथ-साथ होकर भी हम 
नहीं खोएंगे अपनी अस्मिताएं 
सृजन करेंगे मूल्यों और दीर्घकालिक परंपराओं का  
जो कभी गीत और कभी नृत्य बनकर 
जीवित रखेंगी हमारी स्मृतियों को ! 

गुरुवार, जुलाई 12

आस एक अनपली रह गयी


आस एक अनपली रह गयी

एक कथा अनकही रह गयी
व्यथा एक अनसुनी रह गयी,
जिसने कहना सुनना चाहा
वाणी उसकी स्वयं सह गयी !

एक प्रश्न था सोया भीतर
एक जश्न भी खोया भीतर,
जिसने उसे जगाना चाहा
निद्रा उसकी स्वयं सो गयी !

एक चेतना व्याकुल करती
एक वेदना आकुल करती,
जिसने उससे बचना चाहा
पीड़ा उसकी सखी हो गयी !

एक प्यास अनबुझी रह गयी
आस एक अनपली रह गयी,
जिसने उसे पोषणा चाहा
अस्मिता भी कहीं खो गयी !

एक पुकार बुलाती थी जो
इक झंकार लुभाती थी जो,
जिसने उससे जुडना चाहा
घुलमिल उससे एक हो गयी !