एक पुकार बुलाती है जो
कोई कथा अनकही न रहे
व्यथा कोई अनसुनी न रहे ,
जिसने कहना-सुनना चाहा
वाणी उसकी मुखर हो रहे !
एक प्रश्न जो सोया भीतर
एक जश्न भी खोया भीतर,
जिसने उसे जगाना चाहा
निद्रा उसकी स्वयं सो रहे !
एक चेतना व्याकुल करती
एक वेदना आकुल करती,
जिसने उससे बचना चाहा
पीड़ा उसकी सखी हो रहे !
कोई प्यास अनबुझी न रहे
आस कोई अनपली न रहे,
जिसने उसे पोषणा चाहा
सहज अस्मिता कहीं खो रहे !
एक पुकार बुलाती है जो
इक झंकार लुभाती है जो,
जिसने उसको सुनना चाहा
घुलमिल उससे एक हो रहे !
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