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शनिवार, मार्च 11

एक पुकार बुलाती है जो

एक पुकार बुलाती है जो 


कोई कथा अनकही न रहे  

व्यथा कोई अनसुनी न रहे  , 

जिसने कहना-सुनना चाहा 

वाणी उसकी मुखर हो रहे   !


एक प्रश्न जो सोया  भीतर 

एक जश्न भी खोया भीतर, 

जिसने उसे जगाना चाहा 

निद्रा उसकी स्वयं सो रहे    ! 


एक चेतना व्याकुल करती 

एक वेदना आकुल करती,

जिसने उससे बचना चाहा 

पीड़ा उसकी सखी हो रहे ! 


कोई प्यास अनबुझी न रहे  

आस कोई  अनपली न रहे, 

जिसने उसे पोषणा चाहा 

सहज अस्मिता कहीं खो रहे  ! 


एक पुकार बुलाती है जो 

इक झंकार लुभाती है जो, 

जिसने उसको सुनना चाहा 

घुलमिल उससे एक हो रहे  !


शनिवार, अगस्त 2

हर लेता हर कंटक पथ का


हर लेता हर कंटक पथ का


तू गाता है स्वर भी तेरे
लिखवाता नित गान अनूठे,
तू ही गति है जड़ काया में
 बन प्रेरणा उर में पैठे !

तू पूर्ण ! हमें पूर्ण कर रहा
नहीं अपूर्णता तुझको भाती,
हर लेता हर कंटक पथ का
हरि बन सारी व्यथा चुरा ली !

किसका रस्ता अब जोहे मन
पाहुन घर में ही रहता है,
हर अभाव को पूर गया जो
निर्झर उर में बहता है !

तिल भर भी रिक्तता न छोड़े
वही उजाला बन कर छाया,
सारे खन्दक, खाई पाटे
समतल उर को कर हर्षाया !

इक कणिका भी अंधकार की
उस ज्योतिर्मय को न भाती,
एक किरण भी उस पावन की
प्रतिपल यही जताने आती !