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शनिवार, जून 6

चिंगारी प्रेम की

 चिंगारी प्रेम की 

प्रेम कविताएँ और कहानियाँ 

पढ़ी जाती हैं, रची जाती हैं, सुनायी जाती हैं 

क्योंकि प्रेम की जो नन्हीं सी चिंगारी 

छिपी है हरेक मन में 

उसे हवा देकर पल भर को सुलगाती हैं 

या कोई मन छिपाये हो भीतर

 प्यार की सुवास 

वह बिखर जाती है

 किसी अनजान पल में 

जब वह सचेत नहीं है 

रक्षा नहीं कर रहा है 

पहरे पर नहीं खड़ी है बुद्धि 

प्रेम कहो, सुनो या पढ़ो 

यदि रच नहीं सकते 

निज जीवन में भी प्रेम का बसंत छायेगा 

इन्हीं नयनों से इंतज़ार किया था 

सपनों से भरा था मन का आँगन 

वह पुन: नज़र आएगा 

प्रेम पावन है 

क्योंकि प्रेम दान है 

पूजा है अर्पण है ! 

 

शनिवार, मार्च 11

एक पुकार बुलाती है जो

एक पुकार बुलाती है जो 


कोई कथा अनकही न रहे  

व्यथा कोई अनसुनी न रहे  , 

जिसने कहना-सुनना चाहा 

वाणी उसकी मुखर हो रहे   !


एक प्रश्न जो सोया  भीतर 

एक जश्न भी खोया भीतर, 

जिसने उसे जगाना चाहा 

निद्रा उसकी स्वयं सो रहे    ! 


एक चेतना व्याकुल करती 

एक वेदना आकुल करती,

जिसने उससे बचना चाहा 

पीड़ा उसकी सखी हो रहे ! 


कोई प्यास अनबुझी न रहे  

आस कोई  अनपली न रहे, 

जिसने उसे पोषणा चाहा 

सहज अस्मिता कहीं खो रहे  ! 


एक पुकार बुलाती है जो 

इक झंकार लुभाती है जो, 

जिसने उसको सुनना चाहा 

घुलमिल उससे एक हो रहे  !


गुरुवार, जुलाई 12

आस एक अनपली रह गयी


आस एक अनपली रह गयी

एक कथा अनकही रह गयी
व्यथा एक अनसुनी रह गयी,
जिसने कहना सुनना चाहा
वाणी उसकी स्वयं सह गयी !

एक प्रश्न था सोया भीतर
एक जश्न भी खोया भीतर,
जिसने उसे जगाना चाहा
निद्रा उसकी स्वयं सो गयी !

एक चेतना व्याकुल करती
एक वेदना आकुल करती,
जिसने उससे बचना चाहा
पीड़ा उसकी सखी हो गयी !

एक प्यास अनबुझी रह गयी
आस एक अनपली रह गयी,
जिसने उसे पोषणा चाहा
अस्मिता भी कहीं खो गयी !

एक पुकार बुलाती थी जो
इक झंकार लुभाती थी जो,
जिसने उससे जुडना चाहा
घुलमिल उससे एक हो गयी !