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मंगलवार, दिसंबर 19

जो कहा नहीं पर सुना गया

जो कहा नहीं पर सुना गया


शब्दों में ढाल न पाएँगे
जो जाम पिलाये मस्ती के,
कुदरत बिन बोले भर देती
मृदु मौन झर रहा अम्बर से !

मदमस्त हुआ आलम सारा
कुछ गमक उठी कुछ महक जगी,
तितली भँवरों के झुंड बढ़े
कुसुमों ने पलकें क्या खोलीं !

नयनों से कोई झाँक रहा
जाने किस गहरे अन्तस् से,
कानों में पड़ी पुकार मधुर
इक अनजानी सी मंजिल से !

जो कहा नहीं पर सुना गया
इक गीत गूँजता कण-कण में
जो छिपा नहीं पर प्रकट न हो
बाँधें कोई उस बंधन में !

वह पल होते अनमोल यहाँ
खो जाये मन जब खुद ही में,
मिटकर पा लेता कुछ ऐसा
झलके जीवन की गरिमा में !

गुरुवार, अप्रैल 28

खिले रहें उपवन के उपवन

खिले रहें उपवन के उपवन


रिमझिम वर्षा कू कू कोकिल
मंद पवन सुगंध से बोझिल,
हरे भरे लहराते पादप
फिर क्यों गम से जलता है दिल !

नजर नहीं आता यह आलम
या फिर चितवन ही धूमिल है,
मुस्काने की आदत खोयी
आँसू ही अपना हासिल है !

अहम् फेंकता कितने पासे
खुद ही उनमें उलझा-पुलझा,
कोशिश करता उठ आने की
बंधन स्वयं बाँधा न सुलझा !

बोला करे कोकिला निशदिन
हम तो अपना राग अलापें,
खिले रहें उपवन के उपवन
माथे पर त्योरियां चढ़ा लें !

आखिर हम भी तो कुछ जग में
ऐसे कैसे हार मान लें,
लाख खिलाये जीवन ठोकर
क्यों इसको करतार जान लें !

मंगलवार, जनवरी 7

यह तो था अपना ही घर


यह तो था अपना ही घर

पलक बिछाए वह बैठा है
दोनों बाहें भी फैलाये,
एक कदम उस ओर बढ़ें तो  
बड़े वेग से वह भी आये !

प्रियतम का घर दूर नहीं था
राह भटक कर हमीं अभागे,
हाथ थाम कर लाया वह ही
जिस पल थे प्रमाद से जागे !

जाना पहचाना आलम था
यह तो था अपना ही घर,
धूल बहुत फांकी दुनिया की
कभी नजर न डाली भीतर !

एक उजाला मद्धिम मद्धिम
 राग मधुर कोई बजता था,
शांति अगर सी फ़ैल रही थी
प्रेम दीप बन के जलता था !

नहीं छलावा नहीं झूठ का
नहीं लोभ का नाम वहाँ था,
नहीं अभाव न मांग थी कोई
मस्ती का इक जाम वहाँ था !