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मंगलवार, जून 11

मन से कुछ बातें



मन से कुछ बातें


कितने दिन और यहाँ घूमोगे, गाओगे
भटके हो बार-बार कब तक झुठलाओगे ?
 एक न एक.. दिन घर तो आओगे !

स्वाद लिए, रूप देखे, सुर, सुवास में रमे
कदम थके भले यहाँ, पल भर भी नहीं थमे
कितने ठिकानों से दूर किये जाओगे ?
एक न एक दिन.. घर तो आओगे !

कौन सुने बात किसकी बंद कर्ण खुले मुख
तोड़ दिया किसी ने यह शीशाए जिगर फिर
गीत यही आखिर कब तक दोहराओगे ?
एक न एक दिन.. घर तो आओगे !

भूत जान पर लगा है भय भी अनजान का
जब तब सताएगा ही सरस ख्वाब मान का
पहरे कहाँ तब सोच पर  लगा पाओगे ?
एक न एक दिन.. घर तो आओगे !


मंगलवार, अप्रैल 2

माया की माया


माया की माया

जो देख सकती है, वह आँख
नहीं जानती भले-बुरे का भेद
जो देख नहीं सकती, वह आत्मा 
सब जानती है, फिर भी गिरती है गड्ढ में !

जो सुन सकता है, वह कर्ण
नहीं जानता सच-झूठ का भेद
जो सुन नहीं सकती, वह आत्मा 
सब जानती है, फिर भी गिरती है भ्रम में !

देह और आत्मा के मध्य कोई है
जो नहीं चाहता आँख देखे वही जो भला है
श्रवण सुनें वही जो हितकर है
‘माया’ शब्द मात्र नहीं एक सत्ता है
जिसके बल पर चल रहा है
सृष्टि का यह खेल अनंत युगों से !