मन से कुछ बातें
कितने दिन और
यहाँ घूमोगे, गाओगे
भटके हो बार-बार
कब तक झुठलाओगे ?
एक न एक.. दिन घर तो आओगे !
स्वाद लिए,
रूप देखे, सुर, सुवास में रमे
कदम थके भले यहाँ,
पल भर भी नहीं थमे
कितने ठिकानों से
दूर किये जाओगे ?
एक न एक दिन.. घर
तो आओगे !
कौन सुने बात
किसकी बंद कर्ण खुले मुख
तोड़ दिया किसी ने
यह शीशाए जिगर फिर
गीत यही आखिर कब
तक दोहराओगे ?
एक न एक दिन.. घर
तो आओगे !
भूत जान पर लगा
है भय भी अनजान का
जब तब सताएगा ही
सरस ख्वाब मान का
पहरे कहाँ तब सोच
पर लगा पाओगे ?
एक न एक दिन.. घर
तो आओगे !

