मंगलवार, जून 11

मन से कुछ बातें



मन से कुछ बातें


कितने दिन और यहाँ घूमोगे, गाओगे
भटके हो बार-बार कब तक झुठलाओगे ?
 एक न एक.. दिन घर तो आओगे !

स्वाद लिए, रूप देखे, सुर, सुवास में रमे
कदम थके भले यहाँ, पल भर भी नहीं थमे
कितने ठिकानों से दूर किये जाओगे ?
एक न एक दिन.. घर तो आओगे !

कौन सुने बात किसकी बंद कर्ण खुले मुख
तोड़ दिया किसी ने यह शीशाए जिगर फिर
गीत यही आखिर कब तक दोहराओगे ?
एक न एक दिन.. घर तो आओगे !

भूत जान पर लगा है भय भी अनजान का
जब तब सताएगा ही सरस ख्वाब मान का
पहरे कहाँ तब सोच पर  लगा पाओगे ?
एक न एक दिन.. घर तो आओगे !


12 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 122वीं जयंती - राम प्रसाद 'बिस्मिल' और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  2. कंप्यूटर मोबाइल ब्लॉगिंग मेक मनी इंटरनेट से संबंधित ढेर सारी जानकारी अपनी मातृभाषा हिंदी में पढ़ने के लिए विजिट करें aaiyesikhe

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  3. सच कहा है ... जितना जहाँ घूम लो मन घर में ही रमता है ... शान्ति और प्रेम का वास, इश्वर के सबसे निकट घगर ही तो है ... सुन्दर रचना ...

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  4. नमस्कार !
    आपकी लिखी रचना "साप्ताहिक मुखरित मौन में" शनिवार 15 जून 2019 को साझा की गई है......... "साप्ताहिक मुखरित मौन" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  5. भावनाओं की बेहतरीन अभिव्यक्ति । अच्छी लगी यह रचना । आभार ।

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  6. वाह ! बहुत ही सुन्दर रचना ! जैसे उड़ि जहाज को पंछी फिर जहाज पर आवै ! घर तो आना ही होगा !

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  7. भावों से नाजुक शब्‍द......बेजोड़ भावाभियक्ति

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