बुधवार, अगस्त 22

कवि की आत्मा




कवि की आत्मा

एक कविता हूँ मैं
अपने हाथों से लिखा है
जिसे परमात्मा ने
काव्य धर्म है जिसका.....

या अनंत के कैनवास पर
उसकी कूंची से खिंचा
एक स्ट्रोक
उत्सव कर्म है जिसका....

लहर हूँ एक
महाविस्तीर्ण सागर में
 सृष्टि के
नृत्य ही होना है जिसका....

13 टिप्‍पणियां:

  1. मानव जीवन की अंतिम सच्चाई .. निखर कर इस कविता में आई है।

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  2. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 23-08 -2012 को यहाँ भी है

    .... आज की नयी पुरानी हलचल में .... मेरी पसंद .

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  3. very good thoughts.....
    मेरे ब्लॉग

    जीवन विचार
    पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  4. कवि और कवि की आत्मा पर एक सुंदर रूपक...काव्य धर्म,उत्सव कर्म और इन सबके विस्तार के महासागर में नृत्य की तरंग!!! वाह!!!

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  5. माहेश्वरी जी, मनोज जी, संगीता जी, शांति जी व रेवा जी आप सभी का हार्दिक स्वागत व आभार !

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  6. बहुत खूब|||
    बहुत सुन्दर रचना...
    :-)

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  7. सच में कविता कवि की आत्मा ही होती है भावनाओं के सागर का मंथन कर शब्द रुपी रत्न निकल कर आते हैं और कविता का श्रृंगार करते हैं

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