कोमल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कोमल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, जुलाई 7

चाह जो उस की जगी तो



चाह जो उस की जगी तो



राह कितनी भी कठिन हो
दूब सी श्यामल बनेगी,
चाह जो उस की जगी तो
उर कली इक दिन खिलेगी !

जल रहा हर कण धरा का
अनुतप्त हैं रवि रश्मियाँ,
एक शीतल परस कोमल
ताप हरता हर पुहुप का  !

लख नहीं पाते नयन जो
किन्तु जो सब देखता है,
जगी बिसरी याद जिसमें
मन वही बस चेतता है !

व्यर्थ न कण भर भी जग में
अर्थ उसमें कौन भरता,
नयन रोते, अधर हँसते
राज जब खुल रहा लगता !

एक कोमल छांव पल-पल
श्वास में आलोक भरती,
बांह थामे आस्था इक
हर कदम पर साथ देती !

शुक्रवार, सितंबर 16

जबकि भीतर बहते धारे


पड़ोस में एक बच्चे के रोने की आवाज अक्सर आती है जो मुझे बेचैन कर जाती है, कोई उसे  डांटता  है पर  पुचकारता नहीं...

जबकि भीतर बहते धारे


प्रेम नहीं सौदा करते हैं
झूठ ही प्रेम का दम भरते हैं,
जिन पर हम अधिकार जताते
मन ही मन हमसे डरते हैं !

अभी हैं कोमल, अभी आश्रित
एक दिन तो मजबूत बनेंगे,
बात हमारे हाथ में अब तो
कल जाने वह कहाँ खिलेंगे !

धैर्य का इक बिरवा रोपें
मन धरती में कुसुम छिपे हैं,
छिपाए हीरा हर इक भीतर
कंकर क्यों फिर हमीं बिने हैं !

है मिठास का एक भंडार
कृपण हुए मृदु बोल न बोलें,
बाँट-बाँट भी ना हो खाली
फिर भी दिल की गांठ न खोलें !

नदिया की नदिया भीतर है
हम कैसे सागर हैं खारे,
अपनों को भी वंचित रखते
जबकि भीतर बहते धारे !

माटी का तन माटी होगा
प्रेम अमर कर सकता है मन,
बादल बन कर बरस रहा वह
पर सूखे ही रह जाते हम !