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बुधवार, जुलाई 16

ढाई आखर सभी पढ़ रहे

ढाई आखर सभी पढ़ रहे



 प्रेम अमी की एक बूँद ही

जीवन को रसमय कर देती, 

 दृष्टि एक आत्मीयता की 

अंतस को सुख से भर देती ! 


प्रेम जीतता आया तबसे 

जगती नजर नहीं आती थी, 

एक तत्व ही था निजता में 

किन्तु शून्यता ना भाती थी !


 स्वयं शिव से ही प्रकटी शक्ति  

प्रीति बही थी दोनों ओर,

वह दिन और आज का दिन है 

बाँधे कण-कण प्रेम की डोर !


हुए एक से दो थे जो तब 

 एक पुन: वे  होना चाहते,  

दूरी नहीं सुहाती पल भर 

प्रिय से कौन न मिलन माँगते ! 


खग, थलचर या कीट, पुष्प हों 

प्रेम से कोई उर न खाली, 

मानव के अंतर ने जाने 

कितनी प्रेम सुधा पी डाली ! 


करूणा प्रेम स्नेह वात्सल्य 

ढाई आखर सभी पढ़ रहे  

अहंकार की क्या हस्ती फिर, 

प्रेमिल दरिया जहाँ बह रहे !  


शनिवार, सितंबर 24

लहर उठी सागर से कोई

लहर उठी सागर से कोई


​​तू मुझमें ही वास कर रहा

या मैं तेरे घर हूँ आया ?

रहना-आना दोनों मिथ्या  

एक तत्व है कौन पराया !


लहर उठी सागर से कोई 

अगले पल उसमें जा खोयी, 

पल भर का इक नर्तन करके 

निज स्वरूप में जाकर सोयी !


मेरा होना तुझसे ही है 

तू ही मैं बनकर खेले है, 

एक तत्व अखंड  शाश्वत नित 

दिखते जीवन के मेले हैं !


दर्शक बनकर देख रहा तू 

कैसे माया लीला रचती, 

मन खुद  को सर्वस्व समझता   

अंतर को फिर व्याकुल करती !