रविवार, जुलाई 26

सबके दिल की गहराई में

सबके दिल की गहराई में 


इक भूमि की गोद में उगते 

नीम और आमों के तरुवर, 

दोनों जीवन को संजोये 

इक कटु, दूजा मृदु रस भरकर !


सबके दिल की गहराई में 

जीवन का इक अंश छिपा है, 

श्रम के कटु प्रयत्न से मिलता 

स्नेहिल मृदु आँच में पका है ! 


दिल की गहराई में दीपक 

बिन बाती बिन तेल जल रहा,

श्वासों में अहर्निशा जैसे 

सहज मंत्र अनवरत चल रहा !


सुनो ध्यान से, जरा धैर्य से 

 पल भर ठहरो, झाँको भीतर 

राह बनी जाती है ख़ुद ही 

 हौले-हौले चलना जिस पर !

 

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