सच से नाता तोड़ लिया जब
शब्दों में ताक़त होती है
शब्द अगर सच कहना जानें,
धरती ज्यों सहती आयी है
संतानें भी सहना जानें !
माटी, जल में विष घोला है
पनप रही यहाँ लोभ संस्कृति,
खनन किया, वन जंगल काटे
आयी बुद्धि में भीषण विकृति !
युद्धों के पीछे पागल है
दीवाना मानव क्या चाहे,
शिशुओं की मुस्कानें छीनीं
रहीं अनसुनी माँ की आहें !
कहीं सुरक्षित नहीं नारियाँ
वहशी हुआ समाज आज है,
अनसूया-गार्गी की धरती
भयावहता का क्यों राज है !
कहाँ ग़लत हो गयी नीतियाँ
भुला दिये सब सबक़ प्रेम के,
अपना स्वार्थ सधे कैसे भी
शेष रहें हैं मार्ग नर्क के !
टूट रहे परिवार, किंतु है
सीमाओं में जकड़ा मानव !
सच से नाता तोड़ लिया जब
जागा भीतर सोया दानव !
