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मंगलवार, मार्च 31

लौट-लौट आती है प्रतिध्वनि

लौट-लौट आती है प्रतिध्वनि


हर पुकार सुनी जाती है
लौट-लौट आती है प्रतिध्वनि
हर मनुहार चुनी जाती है !

यूँ ही तो नहीं गगन सज रहा
तारों से रात्रि मंडित है,
नव रंगों से उषा निखरती
धरा पादपों से सज्जित है !

रोज बहार खिली आती है
स्वागत करने उस प्रियतम का
बन उपहार चली आती है !

मेघ उमड़ते अमृत जल से
करने धरती का अभिनन्दन,
शस्य श्यामला धरा विहंसती
पुष्प कर रहे जैसे वन्दन !

नित इक धार बही आती है
दे जाती संदेशे उसके
कई आकार धरे जाती है !



मंगलवार, जून 11

आयी है घर में बहार

आयी है घर में बहार

बात पिछली शताब्दी की है
तब इंटरनेट भी नहीं था न मोबाईल
सुबह सवेरे बैठ कर रिक्शे पर
जाती थी छोटी सी बालिका स्कूल
लगाये बालों में रिबन के फूल

फिर बात कुछ वर्ष बाद की...
पहने छोटी सी सलवार-कमीज
समुद्र-टापू खेलते आंगन में
नहीं जाना आज स्कूल..
खेलने दो न, जिद करती माँ से
चली गयी थी फिर विदेश
कहाँ हुई फ़ोन से भी फिर बात  
अब तस्वीरों से ही होती थी मुलाकात
वर्षों बाद एक बार आई थी हमारे साथ
कालेज शुरू करने से पूर्व
फिर की लम्बी पढ़ाई
विवाह बंधन में बंधी
सीए युगल ने दुबई में रह 
सफलता व सम्पन्नता पायी

वापस आकर राजधानी में
सुघड़ गृहस्थी जमाई
बने है वे माँ-पिता  
आज खबर है आयी
गौरव जान चुकी है आज नारी होने का
किसी की तुतलाती बोली में माँ कहलाने का
धरा पर लायी है एक किलकार
देने उसे प्यार और ढेर सारे संस्कार
हर्षित है सारा परिवार
आयी है घर में बहार
हाँ, वह दर्द में है अभी  
पर यही पीड़ा
जीवन का सम्बल बनेगी
भीतर की शक्ति जगेगी  
मिले प्यारी गुडिया को
जीवन के सभी प्राप्तव्य
सुंदर हो भविष्य
और हों कर्म दिव्य
यही है हमारी कामना
नये-नये माँ-पापा के लिए दिली शुभ भावना..