शुक्रवार, नवंबर 29

निशदिन बँटता जाता है वह



निशदिन बँटता जाता है वह



चाँद, सितारे, सूरज मांगे
वही बने हकदार ज्योति के,
काली रातें आँसू चाहे
कैसे  बिछें उजाले पथ में !

निशदिन बँटता जाता है वह
खुद ही तो जड़-चेतन होकर,
अनगिन बार मिला है सब कुछ
फिर-फिर द्वार खड़े सब खोकर !

कितनी बार ख़ुशी छलकी थी
अंतर प्रेम जगाया  सुंदर,
कितने मीत बनाए जग में
कितने गीत रचे थे मनहर !

जितना पाया वह क्या कम था
तुष्टि पुष्प खिला नहीं अब तक,
हो कृतज्ञ कहाँ छलके अश्रु
फिर भी देते जाता है रब !

जो भी जिसने माँगा जग में
अकसर वही वही पाया है,
जितना बड़ा किसीका दामन
उतना उसी में समाया है !


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