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मंगलवार, मई 11

शिक्षा को मूल्यों से भर लें

शिक्षा को मूल्यों से भर लें


अंतरिक्ष तक जा पहुँचा है 

अनगिन तारा मण्डल खोजे, 

सागर की गहराई नापी 

किन्तु हुआ बेबस नर सोचे !


भेद दिया परमाणु मनुज ने 

विनाशकारी बम बरसाया, 

लाखों लोगों को इक पल में 

मृत्यु के आँचल में सुलाया !


सूक्ष्म की ताकत अपरिमित है 

मानव से बढ़ कौन जानता, 

सूक्ष्म तरंगों के बल पर ही 

वर्ल्ड वाइड वेब  रच डाला !


किन्तु सूक्ष्म से लड़ना होगा 

इसकी शायद खबर नहीं थी, 

चिकित्सा पद्धति की सीमा है 

इस तत्व पर नजर नहीं थी !


अभी नहीं था अवगत इससे 

सूक्ष्म जगत भी एक यहां है, 

जीवाणु, विषाणु भी अनेकों 

जिनका बहुत प्रकोप सहा है !


अब भी जाग सकें तो जागें 

जीवन में परिवर्तन कर लें, 

झुकें परम शक्ति के सम्मुख 

शिक्षा को मूल्यों से भर लें !

 

गुरुवार, मई 6

एक दिन

एक दिन  
अनंत है सृष्टि का विस्तार
अरबों-खरबों आकाशगंगाएं हैं अपार
जिनमें अनगिनत तारा मण्डल 

और न जाने कितनी पृथ्वियाँ होंगी 

कितने सौर मण्डल

 जानते हैं इस ब्रह्मांड के बारे में कितना कम 

ब्रह्मांड को छोड़ें तो इस पिंड से भी 

कितने अनभिज्ञ हैं हम 

जैसे जल में मीन 

वैसे हवा में यह तन 

प्राण ऊर्जा जो इस देह को चलाती है 

श्वास के माध्यम से भी भीतर आती है 

शक्ति से भरती है 

भोजन को पचाती 

रक्त को गति देती है 

देह टिकी है जिस पर 

पर आज एक विषाणु ने रोक दिया है 

उसका निर्बाध  विचरण 

फिर भी याद रहे 

ऊर्जा शाश्वत है विषाणु नश्वर 

उसे हराया जा सकता है 

भय को त्याग कर 

स्वयं को सशक्त बनाया जा सकता है 

एक न एक दिन मानवता उससे मुक्ति पा ही लेगी 

उस दिन फिर से गूंजेगी स्कूलों में बच्चों की आवाजें 

और उनके गीतों से फिजा महकेगी ! 


रविवार, जुलाई 12

भय

भय 


भयभीत मन
 कंपता है पीपल के पत्ते की तरह 
हर आशंका के हल्के से झोंके पर 
डोल जाती है उसकी आस्था भी 
भय हर लेता है 
सारी स्थिरता और सौंदर्य अंतर का 
एक सूक्ष्म विषाणु से डरी हुई है आज मानवता
जो प्राणघातक न भी होता 
पर भयाक्रांत मन 
रोक देता है ऊर्जा का प्रवाह अपने ही भीतर
उसकी मति जकड़ जाती है ज्यों 
सद्विचार का प्रवाह रुक जाता है 
बस एक ही विचार 
खोल बना लेता है चारों ओर
भय ही नाश करता है कुछ लोगों का 
विषाणु नहीं 
सम्भवतः वे खो जाते है बेहोशी या तन्द्रा में 
भय से बचने के लिए 
जैसे शुतुरमुर्ग गड़ा लेता है 
अपनी गर्दन रेत में 
महामारी कुछ को लेने आती है 
पर उसका भय अनेकों को ले जाता है !