अग्नि ही उनका सखा है
रह-रह कर कंपकंपाते
शीत में तन सिकुड़ जाते,
पात भी कुछ पीत होकर
सर्दियों में थरथराते !
दूब जो पहले हरी थी
सूखती सी रंगी भूरी,
दिन हुआ छोटा सा देखो
शाम से ही रात उतरी !
ओढ़ कंबल ताप सेंकें
बाल, बूढ़े उस सड़क पर
अग्नि ही उनका सखा है
नहीं हीटर और गीजर !
सुबह सूरज भी संवरता
पहन कर पाले का स्वेटर,
हवा तुम विश्राम ले लो
भाव यह होता मुखर !
सर्दियों की भोर अनुपम
दोपहर बैठक सजाती,
स्वेटरों के रंग खिलते
मूंगफली की दाल गलती !
थी गुलाबी सर्दियाँ जो
आज यौवन पा गयी हैं,
घन कोहरे के कारण
फिर उड़ानें रद हुई हैं !
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