गुरुवार, जनवरी 3

अग्नि ही उनका सखा है


अग्नि ही उनका सखा है

रह-रह कर कंपकंपाते
शीत में तन सिकुड़ जाते,
पात भी कुछ पीत होकर
सर्दियों में थरथराते !

दूब जो पहले हरी थी
सूखती सी रंगी भूरी,
दिन हुआ छोटा सा देखो
शाम से ही रात उतरी !

ओढ़ कंबल ताप सेंकें
बाल, बूढ़े उस सड़क पर
अग्नि ही उनका सखा है
नहीं हीटर और गीजर !

सुबह सूरज भी संवरता
पहन कर पाले का स्वेटर,
हवा तुम विश्राम ले लो
भाव यह होता मुखर !

सर्दियों की भोर अनुपम
दोपहर बैठक सजाती,
स्वेटरों के रंग खिलते
मूंगफली की दाल गलती !

थी गुलाबी सर्दियाँ जो
आज यौवन पा गयी हैं,
घन कोहरे के कारण 
फिर उड़ानें रद हुई हैं !  

15 टिप्‍पणियां:

  1. सही कहा अनीता जी गरीब की साथी तो आग ही है।

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  2. बहुत सुन्दर और सार्थक रचना..नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें..

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  3. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।

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  4. सच में बहुत ठण्ड है इन दिनों :)

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  5. नए-नए बिम्बों से सजया है अपने इस सरदी को।

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  6. जाड़े का सुन्दर दृश्यात्मक वर्णन.....

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  7. इमरान, शरद जी, सुषमा जी, कैलाश जी आप सभी का स्वागत व आभार !

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  8. बेहतरीन माहौल रचा है इस रचना ने परिवेश से संवाद करती है यह रचना और आपकी हरेक पोस्ट .नव वर्ष शुभ हो 24x7x365

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  9. एक तरफ सर्दियों की ठंडक का अहसास तो दूसरी तरफ गरीबों की बेबसी की झलक दिखाती सुन्दर कविता!

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  10. ♥(¯`'•.¸(¯`•*♥♥*•¯)¸.•'´¯)♥
    ♥♥नव वर्ष मंगलमय हो !♥♥
    ♥(_¸.•'´(_•*♥♥*•_)`'• .¸_)♥



    रह-रह कर कंपकंपाते
    शीत में तन सिकुड़ जाते,
    पात भी कुछ पीत होकर
    सर्दियों में थरथराते !

    सर्दी यहां भी बहुत तेज़ है पारा शून्य से अंदर है अभी ...


    आदरणीया अनिता जी
    आपने सर्दी में बेघर बेआसरा लोगों या जिन्हें घर से बाहर काम करने को विवश लोगों की हालत का चित्रण किया है ...
    गरीबों की सुनो , वो तुम्हारी सुनेगा ...
    :)


    नव वर्ष की शुभकामनाओं सहित…
    राजेन्द्र स्वर्णकार
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  11. यही है सर्दी के, चतुर्दिक बिखरे असली रंग !

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