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सोमवार, जुलाई 13

मौन

मौन 


देह करे अवशोषण भोजन का

इतना ही तो पर्याप्त नहीं 

हर विचार, भावना और हर अनुभव को 

आत्मसात करे मन भी !

जीना है हर पल को शिद्दत से 

न रहे कोई कटु स्मृति 

न भीतर रह जाये 

कोई अधपका विचार  

संतुलन ही वह अग्नि है 

जो भीतर जगानी है 

देह और श्वास हों जब संतुलित

प्राण बहते हैं भीतर अबाधित 

साहस जगता है वैसे ही 

जैसे रात के बाद दिन 

संतुलन केवल मौन नहीं है 

वहाँ प्राणों की धारा बहती है 

और ह्रदय ज्ञान से जगमगा उठता है !


 

मंगलवार, मई 19

अभी और यहाँ

अभी और यहाँ 


क्या तुम हो? 

हाँ, इससे कौन इंकार करेगा 

अपना होना तो सबने जाना है !


क्या तुम यहाँ हो ?

इसमें शक है 

तुम कहीं भी हो सकते हो 

चंद्रमा पर, समुद्र के किनारे, बाज़ार में या घर पर ! 


क्या तुम अभी हो ?

इसमें भी शक है 

तुम कल रात में अटके हो सकते हो 

या पिछले साल 

या दस साल पहले की 

किसी बात को याद करके 

आज भी रो सकते हो 

उतनी ही शिद्दत से !


यहाँ और अभी होने के लिए 

बस एक ही शर्त है

अपने केंद्र में रहना सीख लो 

तब कहीं और कभी भी रहो 

तुम सदा ही 

अभी और यहाँ हो !!

 

गुरुवार, अक्टूबर 17

हकीकत



हकीकत 


"हर रात सपनों से भरी थी 

दिवस कोई ख़ाली कहाँ था 

कहाँ पाते ओ ! रब तुझे हम 

बंद जग का हर इक मकाँ था" 



जाना कहाँ था, पहुँचे कहाँ हैं 

दाता का दर सदा ही खुला है 


 भटके थे राह अब चेत आया 

क्या वह मिलेगा जो था गँवाया 


भूले हुए जब घर लौट आते 

कहते हैं, फिर न भूले कहाते 


माँ देखे पथ पिता बाट तकते 

जल्दी जरा ठिकाने को लौटें 


अब भी समय है इसे न गँवायें 

अपनी हकीकत जानें, जतायें 


बुधवार, नवंबर 24

नया दिन

नया दिन 


मिलता है कोरे काग़ज़ सा 

हर नया दिन 

जिस पर इबारत लिखनी है 

ज्यों किसी ख़ाली कैनवास पर 

रंगों से अनदेखी आकृति भरनी है 

धुल-पुंछ गयीं रात की बरसात में 

मन की गालियाँ सारी 

नए ख़्यालों की जिनसे 

बारात गुजरनी है 

हरेक दिन 

एक अवसर बनकर मिला है 

कई बार पहले भी 

कमल बनकर खिला है 

हो जाता है अस्त साथ दिनकर के 

पुनः उसके उजास में 

 कली उर की खिलनी है 

जीवन एक अनपढ़े उपन्यास की तरह 

खुलता चला जाता है 

कौन जाने किस नए पात्र से 

कब मुलाक़ात करनी है 

हर दिन कोई नया ख़्वाब बुनना है 

हर दिन हक़ीक़त भी 

अपनी राह से उतरनी है 

अनंत सम्भावनाओं से भरा है जीवन 

कौन जाने कब किसकी 

क़िस्मत पलटनी है !




रविवार, सितंबर 12

फिर सुनहली भोर आयी


फिर सुनहली भोर आयी


पंछियों  के स्वर अनोखे 

बोल जाने भरे कैसे, 

क्या सुनाते गा रहे हैं 

भोर होते गूंजते से !


तोड़ते निस्तब्धता जो 

यामिनी भर रही छायी,  

दे रहे संदेश मानो 

फिर सुनहली भोर आयी !


कूक कोकिल की सुरीली 

चेतना में प्राण भरती, 

उल्लसित उर सहज होता 

रात का ज्यों अलस हरती !


कंठ में सुर कौन भरता

वाग्देवी ! वाग्देवी ! 

कह रहे हर बोल में वे 

कर रहे ज्यों वंदना ही ! 


शनिवार, सितंबर 4

नींद

नींद 


हर रात हम अपने घर जाते हैं 

अनजाने ही 

और भोर में पोषित होकर लौटते हैं 

जाहिर है घर पर कोई है 

यदि रात सो न सका कोई

तो वह घर का पता ही भूल गया है 

या भटक गया है आधी रात को 

अथवा घर से दूर निकल गया है 

जाना चाहता है 

पर कोई वाहन नहीं मिलता 

भय और थकान भी उसे घेर लेते हैं 

नींद न आने पर अगले दिन 

लोग कैसे खोये-खोये से रहते हैं !


शुक्रवार, मार्च 26

भोर-रात्रि

भोर-रात्रि 


हर सुबह एक नयी कहानी सुनाती है 

हर रात हम अतीत की केंचुल उतार

अस्तित्त्व को सौंप देते हैं स्वयं को 

ताकि वह नया कर सके हमें 

जो तीनों तापों से मुक्त करे 

वही रात्रि है, जो मन को पुनर्नवा करे !

हर दिन कुछ नया पथ तय करना है 

क्योंकि बस आगे ही आगे बढ़ना है 

थोड़ा सा और प्रेम 

और करुणा उस अनंत कोष से लेकर लुटानी है 

थोड़ी सी और समझदारी उस सविता देव से पानी है 

आज वाणी को और मधुर बनाया जा सकता है 

किसी बच्चे को रोते से हँसाया जा सकता है 

एक और दिन मिला है जब 

नए कुछ वृक्ष रोप सकें भू में 

नए कुछ गीत और बिखेर सकें आलम में 

सुरों को और सजीला किया जा सकता है 

रंगों को कैनवास पर किसी और ढंग से 

बिखेरा जा सकता है 

कितना कुछ है जो एक दिन में समा जाता है 

हर रोज एक पूरा जीवन जिया जा सकता है 

हर रात जैसे पुनः हमें तैयार करती है 

स्वप्नों के बहाने कुछ पुरानी यादें मिटाती

नए ख्वाब भरती है !

 

गुरुवार, अक्टूबर 8

प्रार्थना

 प्रार्थना 

जो दिया है तूने हे प्रभु !

असीम है 

नहीं समाता इस झोली में 

तू दिए ही जाता है 

तेरी अनुकम्पा की क्या कोई सीमा है ?

उदार मालिक द्वारा दिए गए अतिरिक्त धन की तरह 

तू भरे जाता है संसार 

मेरा मन झुका है तेरे कदमों में 

बैठा नहीं जाता देर तक 

दुखती है बूढ़ी हड्डियाँ

करवटें बदलते बीतती है रात 

फिर भी जगाता है तू हर प्रभात 

रखता है सिर पर अपना हाथ 

मेरा मन डूब जाता है 

आकाश की तरह विस्तृत उस आनंद में 

जो तू बरसा ही रहा है  

अनवरत ! 


शनिवार, नवंबर 23

जिंदगी


जिंदगी 


जिस घड़ी आ जाये होश जिंदगी से रूबरू हों
एक पल में ठहर कर फिर  झांक लें खुद के नयन में
बह रही जो खिलखिलाती गुनगुनाती धार नदिया
चंद बूंदें ही उड़ेलें उस जहाँ की झलक पालें

क्या यहाँ करना क्या पाना यह सिखावन चल रही है 
बस जरा हम जाग देखें और अपने कान धर लें
नहीं चाहे सदा देती नेमतें अपनी लुटाती
चेत कर इतना तो हो कि फ़टे दामन ही सिला लें

पूर्णता की चाह जागे मनस से हर राह मिलती
ला दिया जिसने सवेरा रात जिससे रोज खिलती
उस भली सी इक ललक को धूप, पानी, खाद दे दें
जो कभी बुझती नहीं है वह नशीली आग भर लें

बुधवार, जून 10

आषाढ़ की एक रात



आषाढ़ की एक रात


बरस बरस दिन भर
पल भर विश्राम लेते बादल
ठिठक गये हैं अम्बर पर
अँधियारा छाया है नीचे ऊपर
बेचैन होंगे चाँद, तारे भी
झांक लें धरा
गा रहे जो गीत झींगुर, सुनने
उसे जरा
युगलबंदी मेढकों की
जुगनुओं की सुप्रभा
रातरानी की महक
जो उड़ रही है हर कहीं
रात अंधियारी लुभाती
नम हुई हर श्वास भी !

शुक्रवार, जून 5

विश्व पर्यावरण दिवस पर शुभकामनायें

विश्व पर्यावरण दिवस पर शुभकामनायें


रोज भोर में
चिड़िया जगाती है
झांकता है सूरज झरोखे से
पवन सहलाती है
दिन चढ़े कागा
पाहुन का लाये संदेस
पीपल की छाँव
अपने निकट बुलाती है
गोधूलि तिलक करे
गौ जब रम्भाती है
झींगुर की रागिनी
संध्या सुनाती है
नींद में मद भरे
रातरानी की सुवास
प्रातः से रात तक
प्रकृति लुभाती है !

नदियाँ दौड़ती हैं सागर तक
देती सौगातें राह भर
अवरुद्ध करे निर्मल धारा
मानव क्यों स्वार्थ कर
अपना ही भाग्य हरे
प्रकृति का चीर हरे !

गुरुवार, फ़रवरी 26

वह हँसी

वह हँसी


परमात्मा सबसे बड़ा विदूषक है
वह जिसे कहते हैं न हंसोड़ !
उसने पट्टी बाँध दी है आँखों पर
और छोड़ दिया है स्वयं को खोजने के काम में
कभी कोई खोल देता है आवरण
तो खिलखिला कर हँस देता है
व्यर्थ के जंजाल से उबर कर
 वही चैन की नींद सोता है

छ्न्न से फूट पडती है हँसी
जब स्वप्न से जग जाता है कोई रात आधी
हमीं थे जो खुद को दौड़ाए जा रहे थे
शेर बनकर खुद को खाए जा रहे थे
और दिन में जो स्वप्न बुने चले जाता है कोई
टूटें...तब भी ऐसा ही हँस देना होगा
जानता है जो... वही असल में जीता है


शुक्रवार, फ़रवरी 6

अब जब कि


अब जब कि

अब जब कि हो गयी है सुबह
क्यों अंधेरों का जिक्र करें,
चुन डाले हैं पथ से कंटक सारे
क्यों पावों की चुभन से डरें !

अब जब कि छाया है मधुमास
अँधेरी सर्द रातों को भूल ही जाएँ,
खिले हैं फूलों के गुंचे हर सूं
क्यों दर्द को गुनगुनाएं !

अब जब कि धो डाला है मन का आंगन
आँधियां धूल भरी क्यों याद रहें,
सुवासित है हर कोना वहाँ
क्यों कोई फरियाद आये !

अब जब कि हो गया है मिलन
विरह में नैन क्यों डबडबायें
बाँधा है बंधन अटूट एक
भय दूरी का क्यों सताए !



मंगलवार, फ़रवरी 3

प्रीत की बौछार

प्रीत की बौछार


आज हुई है जो बात फिर कभी वह बात न होगी
आज की रात जैसी हसीं कभी रात न होगी
आज चाँद ने खोल दिया है अन्तर अपना
चाँदनी की हो रही बरसात फिर ऐसी बरसात न होगी
आज हुई है किसी मीत से मुलाकात
शायद फिर ऐसी मुलाकात न होगी
आज बरसा है टूट कर मेघ शायद फिर न बरसे
आज पुकारा है किसी ने दूर से
फिर यह घटे न घटे
आज बजती हैं झाँझरें और खिलते हैं कमल

आज सजती हैं बहारें और उमड़े आते हैं बादल !

बुधवार, फ़रवरी 26

मिल गयी चाबी

मिल गयी चाबी


रात अँधेरी और घनेरी 

घर का रस्ता भूल गया वह,

दूर कहीं आवाज़ भयानक, 

भटक रहा भयभीत हुआ वह !


टप टप बूँदें, पवन जोर से 

ठंड हड्डियों को कंपाती,

तभी अचानक बिजली चमकी

इक दरवाज़ा  पड़ा  दिखाई !


​​झटपट पहुँचा द्वार खोलने, 

ताला जिस पर लटक रहा था,

सारी जेबें ली टटोल पर

चाबी कहीं गुमा आया था !


खड़ा रुआँसा भीगा, भूखा, 

याद आ रही कोमल शैया,

निद्रा-क्षुधा दोनों सताती, 

लेकिन वह था मजबूर बड़ा !


आसमान को तक के बोला 

तुम्हीं सहायक अब बन सकते,

तभी हाथ कंधे पर आया,

मित्र पूछता, क्या दे सकते?


खुशी और अचरज से बोला 

खोल द्वार चाहे जो माँगो,

तुरत घुमाई उसने चाबी

ला भीतर बोला, अब जागो !


मन ही तो वह भटका राही, 

द्वार आत्मा पर जो आता

बोध सखा स्वरूप  में आकर, 

बस पल में भीतर ले जाता I


मन पाता विश्राम जहाँ पर,

घर अपना वह सुंदर कितना

मिल गयी चाबी पाया तोष, 

‘हो’ होना चाहे फिर जितना I