शुक्रवार, अप्रैल 1

नर्तक एक अनोखा देखा

नर्तक एक अनोखा देखा

धूप नाचती नाचे छाया
वृक्ष नाचते नाचे काया,
मुंदी पलक में स्वप्न थिरकते  
उपवन उपवन पुष्प नाचते !

शिशु कोख में माँ में आशा
बीज धरा में उर अभिलाषा,
नित्य नाचते पल्लव किसलय
सँग नाचते मृण्मय चिन्मय !

श्वासें नाचें रक्त नाचता
शंकर नाचें भक्त नाचता,
हवा नाचती स्थाणु नाचें
अणु-अणु परमाणु नाचें !

नृत्य समाया लहर-लहर में
दृष्टि नाचती डगर-डगर में,
शब्द नाचते कवि कलम में
भाव नाचते पाठक दिल में !

नृत्यांगना के चरण थिरकते
छेनी नाचे प्रस्तर तन पे,
वीणा की स्वरलहरी नाचे
मीरा के पग घुंघरू नाचे !

कृष्ण नाचते राधा नाचे
वन-जंगल में मोर नाचते,
नृत्य कर रही है हर रेखा
नर्तक एक अनोखा देखा !

अनिता निहालानी
१ अप्रैल २०११  

7 टिप्‍पणियां:

  1. अनीता जी,

    कसम से मेरा मन भी नाचने को करने लगा है .........पर यहाँ ऑफिस में ऐसा मुमकिन नहीं है घर पहुँचने तक अपने को सम्भाल लेता हूँ :-)

    खैर पोस्ट बहुत अच्छी है.....नृत्य अगर ह्रदय से निकलता है तो वो परमात्मा से मिलन के बहुत करीब ले के जाता है.....प्रशंसनीय |

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  2. कृष्ण नाचते राधा नाचे
    वन-जंगल में मोर नाचते,
    नृत्य कर रही है हर रेखा
    नर्तक एक अनोखा देखा
    bahut sundar bhavabhivyakti.

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  3. बहुत सुंदर कल्पना -
    मन मयूर थिरक उठा -
    जैसे सावन आ गया -

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  4. आप सभी का आभार मेरे इस नृत्य में शामिल होने के लिये !

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  5. कृष्ण नाचते राधा नाचे
    वन-जंगल में मोर नाचते,
    नृत्य कर रही है हर रेखा
    नर्तक एक अनोखा देखा.

    सुंदर गीत और सुंदर अभिव्यक्ति.

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  6. यह नृत्य ही तो गति का कारण है . गति ही जीवन है, परिवर्तन है, नवीनता है यह नृत्य प्रकृति का है, दृष्टि का है और स्रष्टा का भी. वह तो नाच रहा है, विविध रूपों में, विविध ढंग से परन्तु किसके लिए यह प्रश्न विचारणीय है. इसी प्रश्न को कुछ दिन पहले मैंने उछाला भी था इस रूप में -


    नाच-नाच कर किसे नचाते?
    हे भोले ! तुम किसे बुलाते?
    सब कुछ तो उर में धारण है,
    नृत्य मनोहर किसे दिखाते?

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  7. बहुत अच्छी पोस्ट ..सुंदर गीत

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