गुरुवार, अप्रैल 28

नीड़ बनाना चाहे चिड़िया

नीड़ बनाना चाहे चिड़िया

जाने बनी है किस माटी की
बड़ी हठीली, जिद की पक्की,
नन्हीं जान बड़ी फुर्तीली
लगती है थोड़ी सी झक्की !

सूखे पत्ते, घास के तिनके
सूखी लकड़ी, कपड़े लत्ते
चोंच में भर-भर लाती चिड़िया
नीड़ बनाना चाहे चिड़िया !

बाहर पूरी कायनात है
चाहे जहाँ बनाये घर वो  
न जाने क्यों घर के भीतर
बसना उसको भाए अब तो !

पूजा वाली शेल्फ पे बैठी
कभी ठिकाना अलमारी पर
इधर भगाया उधर आ गयी
विरोध जताती चीं चीं कर !  

हार गए सभी किये उपाय
तोड़ दिया घर कितनी बार
लेकिन उसका धैर्य अनोखा
फिर-फिर लाती तिनके चार !

बंद हुआ जो एक मार्ग तो
झट दूजा उसने खोज लिया
खिडकी की जाली से आयी 
कैसे निज तन को दुबलाया !

शायद उसको जल्दी भी हो
अब नयी जगह ढूंढे कैसे
अप्रैल आधा बीत गया है
घर बस जाये जैसे तैसे !

अनिता निहालानी
२९ अप्रैल २०११ 

6 टिप्‍पणियां:

  1. कितने सुंदर भाव हैं और किस खूबसूरती से आपने उकेरे हैं ...!!
    बहुत सुंदर सृजन ..!!

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  2. अनीता जी,

    बहुत सुन्दर.......घर की ज़रुरत तो सभी को है......और ये पक्षी तो लगन और मेहनत के पुतले हैं........बहुत सुन्दर........यहाँ एक बात कहूँगा - 'बाहर पूरा कायनात है'.......यहाँ 'पूरी' होना चाहिए था क्योंकि कायनात को स्त्रीलिंग के रूप में लिखते है जैसे - दुनिया |
    पर अगर ये टाइपिंग की गलती है तो कोई बात नहीं........

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  3. इमरान जी, बहुत बहुत धन्यवाद, मेरा उर्दू का ज्ञान बढ़ाने के लिये..यह टाइपिंग की गलती हरगिज नहीं है

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  4. नन्ही चिड़िया के मूक शब्दों को परिभाषित करती खुबसूरत रचना |

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  5. प्रभावशाली , चित्ताकर्षक लगी .. शुभकामनायें

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