मंगलवार, अप्रैल 12

रामनवमी के शुभ अवसर पर आप सभी को शुभकामनाएँ !

भीतर कोई जाग गया है

भीतर कोई जाग गया है
जला के कोई आग गया है,
दिव्य अनल शीतल, शुभकारी
दिप-दिप होती अंतर बारी !

जब हम नयन मूंद सो जाते
स्वप्नलोक में दौड़ लगाते,  
तब भी कोई रहे जागता   
खैर हमारी रहे मांगता !

कोई घेरे हर पल हमको
साया कोई साथ लगा है,
सदा निगाहें पीछा करतीं
अंतर में वह प्रीत पगा है !

माँ सा ध्यान रखे है सबका
फिर क्यों दिल में द्वंद्व सहें,  
सौंप सभी कुछ रहें मुक्त हो,
प्रीत में उसकी गीत कहें !

मधुरिम वंशी धुन हो जाएँ
उसकी हाँ में हाँ मिलाएं,
मुक्त गगन सा जीना सीखें
उन पलकों में रहना सीखें !

कैसा अदभुत खेल रचाया
अपनी माया में भरमाया,
मकड़ी जैसे जाल बनाती
संसार स्वयं से उपजाया !

अनिता निहालानी
१२ अप्रैल २०११  

3 टिप्‍पणियां:

  1. भीतर कोई जाग गया है जला के कोई आग गया है, दिव्य अनल शीतल, शुभकारीदिप-दिप होती अंतर बारी !
    sunder bhaavpoorna rachna .

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  2. ये कविता नहीं ,एक ऐसी प्रार्थना है स्वयं को जगानेवाली जैसे कि ठंडे पानी के छींटे डालकर हम अपनी आखें खोलते हैं.इसे तो रोज सुबह पढ़ना होगा.

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  3. अनीता जी,

    देरी की माफ़ी.....आपको भी पावन पर्व की बधाई.......रचना अपने उत्कर्ष पर है.......गहरे धरातल को छूती है ...........ये खास है -

    कैसा अदभुत खेल रचाया
    अपनी माया में भरमाया,
    मकड़ी जैसे जाल बनाती
    संसार स्वयं से उपजाया !

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