शनिवार, अप्रैल 23

बादल बरसा बरसा बादल

आज यहाँ फिर बारिश हो रही है... जोरदार बारिश...


दिल तो बादल है  



दिल है बादल, बादल दिल है
दोनों की इक ही मंजिल है,
खुद से दूर बसे जा दोनों
पीड़ा विरही की हासिल है !

सूरज सुलग रहा ज्यों नभ में
दिल में भी तो लगी आग थी,
नीर उड़ा ले गयी हवाएं
श्वासें नमी ले गयीं दिल की !

उमड़-घुमड़ नयनों से बरसी
वही अमल जलधार बनी है,  
भीतर छाया था तनाव सा  
नभ में ज्यों कैनात तनी है !  

नन्हा सा दिल बिछड़ा खुद से
सँग संसार के उड़ता-फिरता,
पुनः सताती विरह की पीड़ा
रह-रह कर कई बार बरसता !

गरज-गरज कर बरसे बादल
जैसे कोई दिल हो पागल,
प्रथम कालिमा छायी उदासी
धूमिल सी ज्यों प्यास रुआंसी !

फिर अश्रु से आँख भर आयी
अंतहीन तब फूटी रुलाई,
रुकने का क्यों नाम न लेती
ताल-तलैया सब भर देती !

सुबक-सुबक ज्यों रोता बच्चा
बादल भर जाता चहबच्चा
कभी डराता, कभी लुभाता
ओले, वृष्टि सब बरसाता !

बरस रहा अनवरत आज है
जाने इसमें क्या राज है,
सँग बूंदों का बजे साज है
घन बादल का बजे बाज है !

बिछड़ा था जो जल सागर से
बरस-बरस घर आया नभ से,
बादल सागर का था अपना
दूर हुआ ज्यों कोई सपना !


अनिता निहालानी
२३ अप्रैल २०११


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7 टिप्‍पणियां:

  1. एक और सुन्दर कविता आपकी कलम से !

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  2. बारिश मुबारक हो.....सुन्दर कविता से स्वागत है वर्षा का |

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  3. बहुत खूब ...! शुभकामनायें आपके लिए !

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  4. आदरणीया अनीता जी,
    बहुत सुन्दर लिखती हैं आप.
    यह रचना बहुत ही खूब है.
    पहली लाइन पढ़कर की रुकना पडा .

    दिल है बादल, बादल दिल है
    दोनों की इक ही मंजिल है,

    बहुत ही खूब.

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  5. बिछड़ा था जो जल सागर से
    बरस-बरस घर आया नभ से,
    बादल सागर का था अपना
    दूर हुआ ज्यों कोई सपना !

    वर्षा का स्वागत इतने सुंदर गीत से किया है आपने कि मन सचमुच मुदित हो उठा. अभिनन्दन.

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  6. बिछड़ा था जो जल सागर से
    बरस-बरस घर आया नभ से ...

    Bahut khoob .. varsha ka ye varnan bhi naveen hai ... sundar abhivyakti ...

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