शुक्रवार, अप्रैल 22

कैसा यह गोरख धंधा है


कैसा यह गोरख धंधा है

शासन में गोरख धंधा है
हर कोई मांगे चंदा है,
"ए राजा’ को महल दिया
रोटी को तरसे बंदा है I

यहाँ पैसे वाले एक हुए
धन के बल पर नेक हुए,
मिलजुल कर सब मौज उड़ाते
शर्म बेच कर फेक हुए I

हड़प लिये करोड़ों गप से
जरा डकार नहीं लेते,  
अरबों तक जा पहुंची बोली
बस बेचे देश को देते I  

है जनता भोली विश्वासी  
थोड़े में ही संतोष करे
सौंप दी किस्मत जिन हाथों में
वे सारे अपनी जेब भरें I

सदा यही होता है आया
कुछ खट-खट कर श्रम करते
कुछ शातिर बन जाते शासक
बस पैसों में खेला करते I

जागें अब भी कुछ तो सोचें
अपनी किस्मत खुद ही बदलें
जेल ही जिनका असली घर है
ऐसे राजाओं से बच निकलें I

अनिता निहालानी
२२ अप्रैल २०११




3 टिप्‍पणियां:

  1. जनता तो वो भेड है, सदा मुंडते रहना ही जिसकी नियति है ।

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  2. अनीता जी,

    बहुत सुन्दर.....बहुत करारी चोट है......जब तक हम जैसे सोये रहेंगे ऐसे राजा होते रहेंगे......

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