गुरुवार, दिसंबर 1

नर्तक एक अनोखा देखा


नर्तक एक अनोखा देखा 


धूप नाचती नाचे छाया वृक्ष नाचते नाचे काया,
मुंदी पलक में स्वप्न थिरकते, उपवन-उपवन पुष्प नाचते !
शिशु कोख में माँ में आशा, बीज धरा में उर अभिलाषा,

नित्य नाचते पल्लव, किसलय, सँग नाचते मृण्मय, चिन्मय ! 
श्वासें नाचें रक्त नाचता, शंकर नाचें, भक्त नाचता,

हवा नाचती, स्थाणु नाचें, अणु-अणु, परमाणु नाचें ! 
नृत्य समाया लहर-लहर में, दृष्टि नाचती डगर-डगर में,

शब्द नाचते कवि कलम में, भाव नाचते पाठक दिल में !
नृत्यांगना के चरण थिरकते, छेनी नाचे प्रस्तर तन पे,

वीणा की स्वरलहरी नाचे, मीरा के पग घुंघरू नाचे ! 
कृष्ण नाचते राधा नाचे, वन-जंगल में मोर नाचते,

नृत्य कर रही है हर रेखा, नर्तक एक अनोखा देखा ! 

10 टिप्‍पणियां:

  1. वीणा की स्वरलहरी नाचे, मीरा के पग घुंघरू नाचे !
    कृष्ण नाचते राधा नाचे, वन-जंगल में मोर नाचते,

    नृत्य कर रही है हर रेखा, नर्तक एक अनोखा देखा !

    ....वाह! अद्भुत भक्ति और प्रवाहमयी प्रस्तुति...शब्दों, भावों और लय का अप्रतिम संगम...आभार

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  2. बहुत सुन्दर........मन मयूर भी नज्ने को व्याकुल हो उठा है इस कविता के साथ............हैट्स ऑफ |

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  3. अनोखी रचना , भाव नाच रहे हैं मन में.

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  4. अनोखे दृश्य की अनोखी प्रस्तुति!
    अनुपम!

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  5. आहाऽऽहाऽऽहऽ… !
    मन मोर हुआ मतवाला …
    नाचेमन मोरा मगन तृक धा धि गी धि गी

    क्या रचना लिखी है आपने…
    धूप नाचती नाचे छाया वृक्ष नाचते नाचे काया,
    मुंदी पलक में स्वप्न थिरकते, उपवन-उपवन पुष्प नाचते !
    शिशु कोख में माँ में आशा, बीज धरा में उर अभिलाषा,

    नित्य नाचते पल्लव, किसलय, सँग नाचते मृण्मय, चिन्मय !
    श्वासें नाचें रक्त नाचता, शंकर नाचें, भक्त नाचता,

    हवा नाचती, स्थाणु नाचें, अणु-अणु, परमाणु नाचें !
    नृत्य समाया लहर-लहर में, दृष्टि नाचती डगर-डगर में,

    शब्द नाचते कवि कलम में, भाव नाचते पाठक दिल में !
    नृत्यांगना के चरण थिरकते, छेनी नाचे प्रस्तर तन पे,

    वीणा की स्वरलहरी नाचे, मीरा के पग घुंघरू नाचे !
    कृष्ण नाचते राधा नाचे, वन-जंगल में मोर नाचते,

    नृत्य कर रही है हर रेखा, नर्तक एक अनोखा देखा !


    समझ ही नहीं पाया किस पंक्ति को उद्धृत न करूं …


    प्रणाम !

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  6. शब्द नाचते कवि कलम में, भाव नाचते पाठक दिल में !
    नृत्यांगना के चरण थिरकते, छेनी नाचे प्रस्तर तन पे,...बहुत सुन्दर प्रस्तुति...आभार..

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  7. वीणा की स्वरलहरी नाचे, मीरा के पग घुंघरू नाचे !
    कृष्ण नाचते राधा नाचे, वन-जंगल में मोर नाचते,...

    वाह पूरा समा ही जैसे नाचने लगा है ... बहुत ही सुंदरत शब्द साधना ...

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