मंगलवार, दिसंबर 6

जैसे कोई द्वार खुला हो



जैसे कोई द्वार खुला हो

भीतर-बाहर, सभी दिशा में
बरस रहा वह झर-झर, झर-झर,
पुलक उठाता, होश जगाता
भरता अनुपम जोश निरंतर !

जैसे कोई द्वार खुला हो
आज अमी की वर्षा होती,
आमन्त्रण दे मुक्त गगन भी
अंतर सहज ही रहे भिगोती !

रंचमात्र भी भेद नहीं है
जल से जल ज्यों मिल जाता है,
फूट गयीं दीवारें घट की
दौड़ा सागर भर जाता है !

मेघपुंज बन कभी उड़े मन
कभी हवा सँग नृत्य कर रहा,
पीपल की ऊँची फुनगी पर
खग के सुर में सुर भर रहा !

कभी दिशाएं हुईं सुवासित
सौरभ सहज चहूँ ओर बिखरता,
धूप रेशमी उतरी नभ से
जल कण से तृण कोर निखरता !

तन का पोर पोर कम्पित है
गुंजन इस ब्रह्मांड की सुनता,
उर बौराया चकित हुआ सा
देख-देख सब सपने बुनता !

  




8 टिप्‍पणियां:

  1. कितना सुंदर लिखा है .. !

    मेघपुंज बन कभी उड़े मन
    कभी हवा सँग नृत्य कर रहा,
    पीपल की ऊँची फुनगी पर
    खग के सुर में सुर भर रहा !
    इस स्वप्निल सी अनुभूति में हम खो ही गए ...अपार हर्ष देती रचना ...

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  2. खूबसूरत प्रस्तुति ||
    बहुत बहुत बधाई ||

    terahsatrah.blogspot.com

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  3. मेघपुंज बन कभी उड़े मन
    कभी हवा सँग नृत्य कर रहा,
    पीपल की ऊँची फुनगी पर
    खग के सुर में सुर भर रहा !

    पढते पढते ऐसा ही महसूस होने लगा .. सुन्दर रचना

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  4. भीतर-बाहर, सभी दिशा में
    बरस रहा वह झर-झर, झर-झर,
    पुलक उठाता, होश जगाता
    भरता अनुपम जोश निरंतर !

    superb...!!

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  5. अनुपमा जी, मनोज जी, संगीता जी, रविकर जी और वन्दना जी, आप सभी का हृदय से आभार!

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  6. तन का पोर पोर कम्पित है
    गुंजन इस ब्रह्मांड की सुनता,
    उर बौराया चकित हुआ सा
    देख-देख सब सपने बुनता !...

    शायद ऐसा होता है ..आज कल बहुत सुन रहा हूँ बहुत पढ़ भी रहा हूँ ...कभी शायद उतर भी आयेगा !

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