गुरुवार, सितंबर 20

शब्दों की सीमा बाहर है



शब्दों की सीमा बाहर है


शब्दों से ही परिचय मिलता
उसके पार न जाता कोई,
शब्दों की इक आड़ बना ली
कहाँ कभी मिल पाता कोई !

ऊपर ऊपर यूँ लगता है
शब्द हमें आपस में जोड़ें,
किन्तु कवच सा पहना इनको
बाहर ही बाहर रुख मोड़ें !

भीतर सभी अकेले जग में
खुद ही खुद से बातें करते,
एक दुर्ग शब्दों का गढ़ के
बैठ वहीं से घातें करते !

खुद से ही तो लड़ते रहते
खुद को ही तो घायल करते,
खुद को सम्बन्धों में पाके
खुद से ही तो दूर भागते !

हो निशब्द में जिस पल अंतर
एक ऊष्मा जग जाती है,
दूजे के भी पार हुई जो
उसकी खबर लिए आती है !

दिल से दिल की बात भी यहाँ
उसी मौन में घट जाती है,
शब्दों की सीमा बाहर है
भीतर पीड़ा छंट जाती है !

कोरे शब्दों से न होगा
मौन छुपा हो भीतर जिनमें,
वे ही वार करेंगे दिल पर
सन्नाटा उग आया जिनमें !











8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर रचना....
    शब्दों के जंजाल में ही तो उलझा होता है मन का सन्नाटा....

    सादर
    अनु

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    1. आपने सही कहा है अनु जी, शब्दों के जंजाल से पार निकल कर ही वह मौन मिलता है जिसे पाकर कुछ पाना शेष नहीं रह जाता..

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  2. मन के जंजालों से मुक्ति ही ...जीवन है

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    1. अनु जी, मन यानि शब्दों का एक घेरा..निशब्द में ही मुक्ति का अनुभव होता है..

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  3. कभी लगता शब्दों से ही जाहिर होते
    और कभी शब्दों में ही छिप जाते !

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    1. वाणी जी,सही कहा है आपने, शब्द कभी जाहिर करते हैं कभी नहीं...हाँ, शब्दों में बहुत कुछ मिलता है पर वह परम सौंदर्य शब्दों के पार ही है, जिसकी सबको तलाश है..

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  4. खुद से ही तो लड़ते रहते
    खुद को ही तो घायल करते,
    खुद को सम्बन्धों में पाके
    खुद से ही तो दूर भागते !

    वाह...बहुत ही सुन्दर लगी कविता।

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  5. सन्नाटा को भी पढने की कला जिसने जान लिया वही शब्दों के पार जाता है..सुन्दर रचना..

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