बुधवार, सितंबर 12

एक अजूबा है यह दुनिया


एक अजूबा है यह दुनिया


फूलों के हार भी मिलते हैं यहाँ
बैठाया जाता है ऊँचे सिंहासनों पर
फ़ैल जाता है भीतर कुछ...
और एक मुस्कान भर जाती है
पोर–पोर में
अभी चेहरे से उसकी चमक गयी भी नहीं होती
अभी तक उफान शांत हुआ भी नहीं होता भीतर का
कि उतरने का क्षण भी आ जाता है आसन से
फिर छा जाते हैं सिकुड़न, उदासी और भारीपन के बादल
मन के आकाश पर
यूँ कभी सागर की लहरों में आये ज्वार सा मन
छूने लगता है आकाश की ऊँचाइयों को जब
टूट जाता है भ्रम
और जमीनी सच्चाई से पड़ता है पाला

पर.. न सम्मान टिकता है न अपमान...
न जाने कितनी बार यह खेल दोहराया गया है
कितनी ही बार बेगानों व अपनों से मन चोट खाया है
जान लेता है जो 
वह पार हो जाता है
जिंदगी नाम के इस खेल से
जहां जीतो या हारो
अंत में हाथ खाली ही रह जाते हैं
व्यर्थ हो जाते हैं ऊर्जा और समय
देख ले जाग के जो इस सत्य को  
जिसका सम्मान  हुआ वह मैं नहीं था
जिसका अपमान हुआ वह भी नही
सम्मानित किया जिसने यह सोच थी उनकी
अपमान करने वाले की भी अपनी थी मर्जी
उनके मन को भला मैं कैसे जानूँ
जब अपना ही मन न पहचानूँ
कि मेरा होना नहीं टिका है
इन छोटे छोटे सुखों-दुखों पर
जो दूसरे मेहरबानी से मुझपर लुटाते हैं
यह तो कोई और ही बात है
जिस तक पहुंच न सकती कोई आँच  है
जहां न दिन होता न होती रात है
वह एक सा भीतर कोई मैं जाग रहा हूँ
फिर क्यों कुछ पाने बाहर भाग रहा हूँ
बाहर तो लुटाना है
अपनी ऊर्जा अपने ज्ञान का झरना बहाना है
सोचते ही मुस्कान खिल जाती है लबों पर
अखंड आन-शान-बान मिल जाती है भीतर
जो नहीं मुरझाती या खिलती
किसी के सम्मान या अपमान से
दोनों खेल हैं खुद तक ले जाने के लिए
खुद से मिलकर खुद को लुटाने के लिए..

 

22 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन , लाजवाब, शानदार......और शब्द नहीं है आज .....हैट्स ऑफ...

    गुस्ताखी माफ़ आपसे बिना पूछे आपकी ये पोस्ट आपके नाम से फेसबुक पर लिंक की है :-)

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    1. आभार ! आप इसे शौक से शेयर कर सकते हैं

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  2. अपनी ऊर्जा अपने ज्ञान का झरना बहाना है
    सोचते ही मुस्कान खिल जाती है लबों पर
    अखंड आन-शान-बान मिल जाती है भीतर
    जो नहीं मुरझाती या खिलती
    किसी के सम्मान या अपमान से

    बिलकुल सही बात ... सत्य को कहती अच्छी प्रस्तुति

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  3. bahut sundar ...sarthak rachna ..
    abhar Anita ji is rachna ke liye ....!!

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    1. अनुपमा जी, रचना आपको अच्छी लगी, खुशी हुई..

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  4. जान लेता है जो
    वह पार हो जाता है
    जिंदगी नाम के इस खेल से
    जीवन की सच्चाई को बहुत सुन्दर शब्दों में व्यक्त किया है आपने, बहुत सुन्दर प्रेरक रचना... आभार

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  5. वाह...
    बहुत सुन्दर....
    बहुत अच्छी रचना...
    सादर
    अनु

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  6. 'मेरा होना नहीं टिका है
    इन छोटे छोटे सुखों-दुखों पर
    .यह तो कोई और ही बात है
    जिस तक पहुंच न सकती कोई आँच..'
    आत्म-साक्षात्कार के ये पल ही सच हैं ,और सब ऊपरी धूप-छाँह जो आती और बीत जाती है!

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    1. प्रतिभा जी, आपने सच कहा है आत्म साक्षात्कार के बिना मुक्ति नहीं

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  7. adhyatm ki or agrsar karti post....lekin samaj se kat kar uski dhoop/chhanv se bhi to kat kar insan ji nahi sakta.

    agar ji sakta hota to shuru se hi vaanprasth le leta.

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    1. अनामिका जी, समाज से कटकर नहीं समाज में रहते हुए ही समता को विकसित करना होगा

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  8. अपनी ऊर्जा अपने ज्ञान का झरना बहाना है
    सोचते ही मुस्कान खिल जाती है लबों पर
    अखंड आन-शान-बान मिल जाती है भीतर
    जो नहीं मुरझाती या खिलती
    किसी के सम्मान या अपमान से
    दोनों खेल हैं खुद तक ले जाने के लिए
    खुद से मिलकर खुद को लुटाने के लिए..

    बहुत ही पते की बात बता दी है आपने अनीता जी.
    खुद से मिलना ही सर्वोच्च लक्ष्य होना चाहिये.

    लाली मेरे लाल की,जित देखू तित लाल
    लाली देखन मैं गयी,मैं भी हो गयी लाल.

    बाहर और अंदर सर्वत्र वही तो है.

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    1. राकेश जी, आपने सही लिखा है हर सूँ उसी का नजारा है..

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  9. अपनी ऊर्जा अपने ज्ञान का झरना बहाना है
    सोचते ही मुस्कान खिल जाती है लबों पर
    अखंड आन-शान-बान मिल जाती है भीतर
    जो नहीं मुरझाती या खिलती
    किसी के सम्मान या अपमान से
    दोनों खेल हैं खुद तक ले जाने के लिए
    खुद से मिलकर खुद को लुटाने के लिए..

    बहुत सच एकदम आध्यात्मिक ।

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  10. बढिया प्रस्तुति ...मुक्ति का एक सशक्त मार्ग

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