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बुधवार, जून 8

छुए जाता है पवन ज्यों

छुए जाता है पवन ज्यों 


ज़िंदगी पल-पल गुजरती 

रूप निज हर क्षण बदलती, 

 जैसे मिले, स्वीकार लें 

देकर प्रथम, अधिकार लें ! 


व्यर्थ ही हम जूझते हैं 

बह चलें सँग धार के यदि, 

ऊष्मा भाव की खिल के 

मुक्त होगी निज व उनकी !


चार दिन का साथ है यह 

क्यों यहाँ ख़ेमे लगाएँ, 

छुए जाता है पवन ज्यों 

इस जहाँ से गुजर जाएँ !


मंगलवार, दिसंबर 28

हो निशब्द जिस पल में अंतर


हो निशब्द जिस पल में अंतर

शब्दों से ही परिचय मिलता

उसके पार न जाता कोई,

शब्दों की इक आड़ बना ली

कहाँ कभी मिल पाता कोई !

 

ऊपर-ऊपर यूँ लगता है

शब्द हमें आपस में जोड़ें,

किन्तु कवच सा पहना इनको

बाहर ही बाहर रुख मोड़ें !

 

भीतर सभी अकेले जग में

खुद ही खुद से बातें करते,

एक दुर्ग शब्दों का गढ़ के

बैठ वहीं से घातें करते !

 

खुद से ही तो लड़ते रहते

खुद को ही तो घायल करते,

खुद को सम्बन्धों में पाके

खुद से ही तो दूर भागते !

 

हो निशब्द जिस पल में अंतर

एक ऊष्मा जग जाती है,

दूजे के भी पार हुई जो

उसकी खबर लिए आती है !

 

दिल से दिल की बात भी यहाँ

उसी मौन में घट जाती है,

शब्दों की सीमा बाहर है

भीतर पीड़ा छंट जाती है !

 

कोरे शब्दों से न होगा

मौन छुपा हो भीतर जिनमें,

वे ही वार करेंगे दिल पर

सन्नाटा उग आया जिनमें !


मंगलवार, जनवरी 24

लौट आना है उसे घर



लौट आना है उसे घर

घूम कर सारा जहाँ
लौट आना है उसे घर,
गंगोत्री से उमगी धारा
जा पहुँची जो गंगा सागर  !

हुई वाष्पित उडी गगन में
बरसी जा पहुँची शिखरों पर,
पिघली, बही पुनः लौटी
यही चक्र चलता है अविरत !

कुछ बूंदें रह गयीं जमीं ही
कुछ ने सागर को घर माना,
वंचित हैं बहने के सुख से
नीलगगन का सुख न जाना !

एक यात्रा अनजानी सी
शेष सभी तय करती हैं,
काट पत्थरों, चट्टानों को
गहन गुफाओं में बहती हैं !

तपकर सोख ऊष्मा रवि की
मीलों चलकर मिलतीं घन से,
सृष्टि चक्र अनोखा कितना
चले अहर्निश युगों-युगों से !

सोमवार, नवंबर 11

कोई

कोई

हर प्रातः सूर्य किरणों पर चढ़
पुहुपों के अंतर को छूकर
ओस कणों से ले नरमी
खग पाखों से ले गरमी
 कोई वसुंधरा पर उतरे !

हर साँझ रंग आंचल में भर
वृक्षों की फुनगी पर जाकर
रिमझिम फुहार से ले नमी
सतरंगी आभा पा थमी  
कोई नजर नयन में कांपे !

हर रात्रि चाँदनी वसन ओढ़
जुगनू की नीली छवि छूकर
संध्या तारे से ले चमक
ढलते सूरज से ले दमक
कोई दूर क्षितिज से झांके !

अंतर ऊष्मा से स्पन्दित हो
 पर दुःख से द्रवीभूत कातर
ले उच्छ्वासों से असीम वेग
 श्वासों से ऊर्जित संवेग
कोई कवि कंठ बन गाए !



  


गुरुवार, सितंबर 20

शब्दों की सीमा बाहर है



शब्दों की सीमा बाहर है


शब्दों से ही परिचय मिलता
उसके पार न जाता कोई,
शब्दों की इक आड़ बना ली
कहाँ कभी मिल पाता कोई !

ऊपर ऊपर यूँ लगता है
शब्द हमें आपस में जोड़ें,
किन्तु कवच सा पहना इनको
बाहर ही बाहर रुख मोड़ें !

भीतर सभी अकेले जग में
खुद ही खुद से बातें करते,
एक दुर्ग शब्दों का गढ़ के
बैठ वहीं से घातें करते !

खुद से ही तो लड़ते रहते
खुद को ही तो घायल करते,
खुद को सम्बन्धों में पाके
खुद से ही तो दूर भागते !

हो निशब्द में जिस पल अंतर
एक ऊष्मा जग जाती है,
दूजे के भी पार हुई जो
उसकी खबर लिए आती है !

दिल से दिल की बात भी यहाँ
उसी मौन में घट जाती है,
शब्दों की सीमा बाहर है
भीतर पीड़ा छंट जाती है !

कोरे शब्दों से न होगा
मौन छुपा हो भीतर जिनमें,
वे ही वार करेंगे दिल पर
सन्नाटा उग आया जिनमें !