सोमवार, जून 3

बरसे नभ से मधुरिम सागर

बरसे नभ से मधुरिम सागर


मचल रहा बाहर आने को
ठांठे मारे एक समुन्दर,
आतुर है सुवास अनोखी
चन्दन वन सी अगन सुलगकर !

नदी बह रही ज्योति उर्मि
भीतर सूरज कई छिपे हैं,
एक शहद में भीगी वाणी
मधुर गीत अभी कहाँ कहे हैं !

झरते कोमल कुसुम कुदुम्बी
वैजन्ती माला की झालर,
जगमग हीरा कोई चमकता
बरसे नभ से मधुरिम सागर !

खाली जब अंतर आकाश
ज्योति बही जाती है अविरल
उसी एक की खुशबू फैली
वही करेगा अंतर अविकल !


4 टिप्‍पणियां:

  1. वही करेगा अंतर अविकल !

    bahut sundar ....!

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  2. बहुत ही अच्छी रचना........शुभकामनायें ।

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  3. खाली जब अंतर आकाश
    ज्योति बही जाती है अविरल
    उसी एक की खुशबू फैली
    वही करेगा अंतर अविकल !

    बहुत सुंदर ....

    उत्तर देंहटाएं