सोमवार, जुलाई 8

अब पुनःरुक्त नहीं होना है

अब पुनःरुक्त नहीं होना है

पूछ रहा है पता ठिकाना
भीतर अपनी याद खो गयी,
उन्हीं रास्तों पर चलता है
खुले नयन, पर दृष्टि सो गयी !

साँझ-सवेरे भी बदलेंगे
बीज अलख का इक बोना है,
सतत् प्रयाण रहे चलता
अब पुनःरुक्त नहीं होना है !

सिंचन प्रतिपल नव कुसुमों का
छिपे हुए जो अभी धरा में,
मानस-भू पाषाण बनी जो  
पिघलेगी ही सघन त्वरा में !

मन से ऊपर, परे भाव से
इक जोगी वाला डेरा है,
वहाँ न श्याम रात का साया
हर पल ही नया सवेरा है !


11 टिप्‍पणियां:

  1. सिंचन प्रतिपल नव कुसुमों का
    छिपे हुए जो अभी धरा में,
    मानस-भू पाषाण बनी जो
    पिघलेगी ही सघन त्वरा में !

    वाह ... बहुत सुंदर ।

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  2. सुन्दर.....
    गहन भाव....

    सादर
    अनु

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  3. गहन भाव लिए सुन्दर रचना..आभार

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  4. इक जोगी वाला डेरा है,
    वहाँ न श्याम रात का साया
    हर पल ही नया सवेरा है

    बहुत सुंदर प्रस्तुति .....!!

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  5. मन से ऊपर, परे भाव से
    इक जोगी वाला डेरा है,
    वहाँ न श्याम रात का साया
    हर पल ही नया सवेरा है !

    बहुत बहुत सुन्दर।

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  6. असंजस की स्थिति में जब कोई चिंतन मनन होता है ..कामयाबी वाली राह कोई अलग सी निकलती है।

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  7. कल 11/07/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

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  8. 'मन से ऊपर, परे भाव से
    इक जोगी वाला डेरा है,
    वहाँ न श्याम रात का साया
    हर पल ही नया सवेरा है !'

    So well put!!!

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  9. संगीता जी, अनुपमा जी, रोहितास जी, इमरान, मदन जी, रंजना जी, माहेश्वरी जी, अनु जी आप सभी का स्वागत व आभार!

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