बुधवार, जुलाई 3

एक विजय प्रयाण चल रहा

एक विजय प्रयाण चल रहा


एक विजय प्रयाण चल रहा
हर क्षण इक संग्राम चल रहा,
भेदन, शोधन, संवर्धन का
प्रतिपल इक अभियान चल रहा !

गहन गुफाओं से अंतर की
धाराएँ ऊपर उठती हैं,
सौम्य भाव बहे अम्बर से
संग मेघ रूप धरती हैं !

इक सागर ज्योति का जिस पर  
गहन आवरण अन्धकार का,  
एक परम ऊर्जा सोयी  
इक आनंद है महाकार सा !

कोई अविरत सदा जगाता  
चरैवेति का मंत्र सुनाता,  
दुख दानव बलशाली कितना  
सुख देव की विजय कराता !  

प्रतिपल कोई साथ हमारे
सिर पर हाथ धरे है चलता,
विजय सत्य की ही होती है
स्वपन अगन सा जलता रहता !

दिव्य लोक से आवाह्न इक
अभीप्सा सत्य की जगाये,
आरोहण करने की प्रेरणा
निर्मल मन में भरती जाये !   


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