बुधवार, जुलाई 24

एक दिन अचानक

एक दिन अचानक


सुना तो था उसने
सबसे प्रेम करो
पर दिल का दरवाजा था कि
खुलता ही नहीं था सबके लिए....
जंग लग गयी सिटकनी में या
जम गयी थी धूल-मिट्टी दरारों में
पर सुनना जारी रहा तो एक दिन अचानक...
टूट गयी दीवारें दरवाजे सहित !
और एक लहर सी दौड़ती आई
जो अवरुद्ध थी भीतर
हरियाली छा गयी मन उपवन में
उठने लगे सुरभि के बगूले
जो सामने आया बच न पाया उसकी गिरफ्त से
श्वास लेना भी तब दे रहा था स्वर्गिक आनन्द
मुस्कुराहट को पसंद आ गया था उसका मुखड़ा
ईश्वर तब संगी साथी बन गया था और वह सहज ही एक ऊर्जा
जिसमें झलक जाती है हल्की सी भी कालिमा
ऐसा श्वेतकमल सा पारदर्शी हो गया था मन उसका
पल भर में सिलवट संवर जाती है ज्यों
ऐसे ही स्वच्छ हो जाता था
फूल की चोट खाकर आहत हुआ हो ज्यों कोई जलाशय
सारी दुनिया अपना विस्तार नजर आने लगी थी
मिट गये थे सारे भेद
छिन्न भिन्न हो जाते हैं ज्यों बादल बरसते ही...
प्रेम तब करना नहीं था

उसने जाना वह प्रेम ही था.... 

14 टिप्‍पणियां:

  1. पारदर्शी मन लिए प्रेम का मूर्त रूप हो जाना...
    सबके साथ घटित हो ऐसा!

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    1. अनुपमा जी, हो तो सकता है ऐसा यदि कोई दिल से चाहे....

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  2. सुन्दर प्रस्तुति -
    आभार आपका -

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  3. प्रेम का ऐसा उदात्त रूप ही हमारे यहाँ मान्य है । लेकिन अब प्रेम का अर्थ ही बदल गया है ।

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    1. आभार गिरिजा जी, प्रेम का अर्थ बदल गया हो पर प्रेम का तत्व तो वही रहेगा..

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  4. सच्चा प्रेम तो ऐसा ही होता है..अति सुन्दर कहा है..

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    1. प्रेम है तो सच्चा ही है नहीं है तो उसे कोई भी नाम दें...अनुभव में नहीं आयेगा...

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  5. संगीता जी, अनु जी, रविकर जी, कालीपद जी व वन्दना जी आप सभी का स्वागत व आभार !

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  6. प्रेम को खूबसूरती से परिभाषित करती रचना।

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