शुक्रवार, जुलाई 12

बहती अमृत धार रसीली

बहती अमृत धार रसीली


अनगिन, अविरत, झर-झर देखो
धाराएँ अम्बर से बरसें,
नद-नाले पोखर झीलों के
सूने घट भर जाएँ फिर से !

ताप ले गया जिसे चुराकर
पुनः भरे व नमी सजीली,
कण-कण सिंचित हो वसुधा का
बहती अमृत धार रसीली !

कैसा अद्भुत समां बंधा है
इक रव कोई गुंजा रहा है,
ताल बद्ध, इक लय है जिसमें
मानो अम्बर थिरक रहा है !

चकित हुए से पाखी ताकें
छिपे हुए पत्तों, कोटों से,
प्रकृति सबको पनाह दे रही
शिशु जैसे माँ के आंचल में !

अभी दिवस थोड़ा बाकी था
बदली से श्यामलता छाई,
पवन भी जल संग मस्त हुआ है
गुलमोहर डाली मुस्काई !

टपटप, छपछप, टिपटिप छमछम
जाने कितने स्वरों में गाये,
वर्षा भिगो गयी मानस को
पावस अंतर आस जगये !


15 टिप्‍पणियां:

  1. तरोताजा कर गई - शीतल पवन सी ।

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  2. सुन्दर चित्र पावस का .मानवीकरण प्रकृति और उसके उपादानों का .शुक्रिया आपकी टिपण्णी का .

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  3. बहुत सुन्दर कविता....बिलकुल अमृत धार की तरह की मन को भिंगोती हुई.

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  4. बहुत खुबसूरत एहसास पिरोये है अपने......

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  5. बेहतरीन रचना और सुंदर अभिव्यक्ति .......!!

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    1. इमरान, दयानन्द जी, कालीप्रसाद जी, माहेश्वरी जी, सुषमा जी, अमृता जी, रंजना जी, प्रतिभा जी, निहार जी, वीरू भाई आप सभी का स्वागत व आभार!

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  6. कल 15/07/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

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