शुक्रवार, अगस्त 30

खो गया है आदमी

खो गया है आदमी

भीड़ ही आती नजर  
खो गया है आदमी,
इस जहाँ की इक फ़िकर
 हो गया है आदमी !

दूर जा बैठा है खुद
फ़ासलों की हद हुई,
हो नहीं अब लौटना
जो गया है आदमी !

बेखबर ही चल रहा
पास की पूंजी गंवा,
राह भी तो गुम हुई
धो गया है आदमी !

बांटने की कला भूल
संचय की सीख ली,  
बंद अपने ही कफन में
सो गया है आदमी !

श्रम बिना सब चाहता
नींद सोये चैन की,
मित्र बन शत्रु स्वयं का
हो गया है आदमी !

प्रार्थना भी कर रहा  
व्रत, नियम, उपवास भी,
वश में करने बस खुदा  
लो गया है आदमी !


18 टिप्‍पणियां:

  1. प्रार्थना भी कर रहा
    व्रत, नियम, उपवास भी,
    वश में करने बस खुदा
    लो गया है आदमी !

    ह्रदय की बात को कह दिया है आपने..जितनी प्रशंसा करूँ कम है..

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  2. सुन्दर भाव प्रगटीकरण-

    शुभकामनायें-

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  3. एक एक पंक्ति बेहतरीन है बहुत ही सुन्दर सी कविता .........हैट्स ऑफ इसके लिए |

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  4. प्रार्थना भी कर रहा
    व्रत, नियम, उपवास भी,
    वश में करने बस खुदा
    लो गया है आदमी !

    ...वाह!

    उत्तर देंहटाएं
  5. बांटने की कला भूल
    संचय की सीख ली,
    बंद अपने ही कफन में
    सो गया है आदमी !

    ...बहुत सटीक और ख़ूबसूरत प्रस्तुति...

    उत्तर देंहटाएं
  6. सचमुच आदमी अपने आप से कहीं दूर जा रहा है । प्रभावपूर्ण प्रस्तुति ।

    उत्तर देंहटाएं
  7. बांटने की कला भूल
    संचय की सीख ली,
    बंद अपने ही कफन में
    सो गया है आदमी !

    गूढ अर्थ लिए सुंदर रचना

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - रविवार -01/09/2013 को
    चोर नहीं चोरों के सरदार हैं पीएम ! हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः10 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra

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  9. कल 01/09/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

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  10. आदमी को मारकर ही खा रहा है आदमी। बेहद खूब सूरत रचना है "खो गया है आदमी "आप भी पढ़िए -

    खो गया है आदमी
    खो गया है आदमी


    भीड़ ही आती नजर
    खो गया है आदमी,
    इस जहाँ की इक फ़िकर
    हो गया है आदमी !

    दूर जा बैठा है खुद
    फ़ासलों की हद हुई,
    हो नहीं अब लौटना
    जो गया है आदमी !

    बेखबर ही चल रहा
    पास की पूंजी गंवा,
    राह भी तो गुम हुई
    धो गया है आदमी !

    बांटने की कला भूल
    संचय की सीख ली,
    बंद अपने ही कफन में
    सो गया है आदमी !

    श्रम बिना सब चाहता
    नींद सोये चैन की,
    मीत बन शत्रु खुद का
    हो गया है आदमी !

    प्रार्थना भी कर रहा
    व्रत, नियम, उपवास भी,
    वश में करने बस खुदा
    लो गया है आदमी !

    Posted by Anita at शुक्रवार, अगस्त 30, 2013
    Labels: आदमी, नियम, प्रार्थना, बेखबर, भीड़, राह, श्रम

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  11. Virendra Sharma
    2 सेकंड पहले Canton के पास
    आदमी को मारकर ही खा रहा है आदमी। बेहद खूब सूरत रचना है "खो गया है आदमी "आप भी पढ़िए -

    खो गया है आदमी
    खो गया है आदमी

    भीड़ ही आती नजर
    खो गया है आदमी,
    इस जहाँ की इक फ़िकर
    हो गया है आदमी !
    ...और आगे देखें

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहुत ही सुन्दर सी कविता

    उत्तर देंहटाएं
  13. वाह। । सुन्दर प्रस्तुति। । कभी मेरी रचनाये भी देखें …. आभार

    उत्तर देंहटाएं
  14. बांटने की कला भूल
    संचय की सीख ली,
    बंद अपने ही कफन में
    सो गया है आदमी !
    बहुत सुन्दर भाव लिए कविता..

    सादर
    अनु

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  15. भीड़ ही आती नजर
    खो गया है आदमी,

    सुन्दर प्रस्तुति

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  16. आप सभी सुधी पाठक जनों का हार्दिक स्वागत व आभार !

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  17. सुन्दर ,सरल और प्रभाबशाली रचना। बधाई।
    कभी यहाँ भी पधारें।
    सादर मदन
    http://saxenamadanmohan1969.blogspot.in/
    http://saxenamadanmohan.blogspot.in/

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