मंगलवार, जनवरी 14

अरुणाचल की एक छोटी सी यात्रा



अरुणाचल की एक छोटी सी यात्रा
   

पिछले वर्ष के अंतिम दिन प्रातः आठ बजे हम दुलियाजान-असम से अरुणाचल प्रदेश के शहर MIAO, जिला चांगलांग नामक स्थान के लिए रवाना हुए, उससे पहले हमें मानाभूम जाना था. माकूम, दुमदुमा और डेरौक होते हुए हमारी जीप टाटा सूमो आगे बढ़ रही थी. एक स्थान पर जहाँ हमें दाएं मुड़ना था, असावधानी वश उसे छोड़कर जीप का ड्राइवर सीधा चलता गया, पता नहीं किस अदृश्य शक्ति ने हमें सचेत किया और एकाएक सभी कहने लगे, किसी से रास्ता पूछ लेना चाहिए, पूछने पर पता चला हम १३ किमी आगे निकल आये हैं, वापस गये और उस मोड़ से कुछ अच्छे कुछ खराब रास्तों से गुजर कर साढ़े बारह बजे के लगभग मानाभूम के गेस्ट हाउस पहुंचे. जहाँ स्वादिष्ट भोजन हमारी प्रतीक्षा कर रहा था. मानाभूम में आयल का कैम्प है, भोजन में चार तरह की सब्जियां व दाल थी, पापड़ भी थे. मार्ग में सरसों के पीले फूलों से सजे खेत तो थे ही, लाल तने और फूलों वाले खेत भी मनोहारी थे. हम सभी को यह जानने की उत्सुकता थी की इन फूलों का नाम क्या है. वहाँ के एक स्थानीय व्यक्ति ने बताया इसे फाफड़ कहते हैं, यह एक अनाज है जिसके स्वादिष्ट व्यंजन बनते हैं, हमने निर्णय लिए वापसी में इस अन्न को बाजार से ले चलेंगे, नये साल के कारण बाजार तो बंद था पर बाद में गूगल में खोज करने पर पता चला यह तो कुट्टू था, जिसका व्यवहार हम व्रत में करते आये हैं, कुट्टू के खेत और उसकी फसल काटते हुए एक अरुणाचली महिला की सुंदर तस्वीर हमारे अलबम में कैद हो गयी है.

भोजन के बाद हम नोआडीहिंग नदी के तट पर आये, मार्ग में कई जगह नदी की उथली धाराओं  को पार करना पड़ा. तट पर अनेकों व्यक्ति पिकनिक मना रहे थे. काफी चहल-पहल थी, संगीत भी बज रहा था और कुछ जगह लोग पत्थरों को जोड़ कर बनाये चूल्हों में लकड़ी जलाकर भोजन बना रहे थे. हमें नदी पार करनी थी, कोई पुल नहीं था, दो नावों को जोडकर एक लकड़ी का प्लेटफार्म बनाया गया था जिसपर अत्यंत सावधानी के साथ ड्राइवर ने गाड़ी चढ़ाई कुछ लोग ड्राइवर के साथ नाव में ही रहे और कुछ नाव में बैठे, धीरे-धीरे नाव को धकेलते हुए नाविक उस पार ले गये. बड़ी और छोटी सभी गाड़ियाँ इसी तरह नावों से पार की जा रही थीं. यह भी एक रोमांचक अनुभव था.

 तट पर हजारों छोटे बड़े पत्थर थे, जिन पर पैर रखते हुए सम्भलते हुए हम पुनः गाड़ी में बैठे और MIAO के सर्किट हाउस पहुंच गये. वहाँ हमारे सिवा कोई अन्य यात्री नहीं था, वर्ष का अंतिम दिन था सो सभी कर्मचारी मस्ती के मूड में थे. पर हमारे कमरे स्वच्छ व सुविधाजनक थे. सामान रखकर हम पैदल ही निकल पड़े और कच्चे रास्ते से ढलान पर पांव रखते पुनः नदी तट पर आये, जहां पानी की स्वच्छ, निर्मल, शीतल लहरों में भीगने का आनन्द लिया. चिकने पत्थरों (काई के कारण) पर हौले-हौले कदम बढ़ाते हुए नदी पार की और रेत में बैठकर डूबते हुए सूर्य की किरणों को निहारते रहे. नीचे धरा का स्पर्श, सामने अग्नि सम सूर्य और जल का अखंड प्रवाह, बीच-बीच में हवा का सिहरन भरा स्पर्श और यह सब चल रहा था अनंत आकाश के नीचे. हमारे मन व प्राण पाँचों तत्वों का अनुभव एक साथ कर रहे थे. वहाँ से लौटकर कुछ देर सर्किट हाउस के लॉन में जिसकी घास शीत के कारण भूरी हो गयी थी तथा जिसके किनारे क्यारियों में गुलदाउदी तथा गेंदे के फूल लगे थे, हमने फ्रिस्बी का खेल खेला, बचपन जैसे पुनः लौट आया. बाहर निकल कर प्रकृति के सान्निध्य में पुनः मन बालवत् हो जाता है. शाम को हम यहाँ का नया चर्च देखने गये, जो एक पहाड़ी पर बना है तथा बहुत ऊंचा है, दूर से ही उसकी दीवार पर बनी ईसा की नीली मूर्ति दिखाई देती है. काफी सीढ़ियाँ चढकर हम ऊपर गये तो दीवारों पर बाइबिल से सम्बन्धित चित्र बने थे. जगह-जगह क्रिसमस की झांकियां सजी थीं. चर्च से लौटे तो अँधेरा हो चुका था, हमने कमरे में ही आकर हल्का नाश्ता किया और चाय पी. कुछ देर कार्ड्स का गेम खेला, और तब यहाँ के केयर टेकर शर्मा जी ने रात्रि भोजन के लिए बुलाया, वे भी जल्दी काम निपटा कर नये वर्ष के स्वागत के लिए अपने घर जाना चाहते रहे होंगे. भोजन हल्का और घर जैसा था. बाहर निकल कर आये तो आकाश जैसे नीचे सिमट आया हो, अम्बर  पर सैकड़ों तारे जगमगा रहे थे, जिनका प्रकाश प्रदूषण न होने के कारण सीधा आँखों तक पहुंच रहा था. सामने चर्च की बत्तियां भी जल चुकी थीं, ईसा की मूर्ति अब अलग ही प्रभाव डाल रही थी. हमने कुछ चित्र लिए और बढ़ती हुई ठंड के कारण कमरे में आ गये. नया वर्ष आरम्भ होने में कुछ ही घंटे शेष थे.


अगले दिन सुबह नहा-धोकर व चाय पीकर हम आस-पास का जायजा लेने निकल पड़े, विशाल वृक्ष, हरी-भरी घाटियाँ, कुछ सुंदर घर और अन्य इमारतें देखते हम एक पेड़ के पास आकर रुके, जहाँ नीचे लाल रंगे के चमकदार मोती जैसे बीज बिखरे थे, वे इतने सुंदर थे कि हमने स्मृति के लिए कुछ एकत्र किये, अरुणाचल के लोग छोटे कद के होते हैं तथा महिलाएं बहुत सुंदर होती हैं, रास्ते में कुछ सुंदर लडकियाँ परम्परागत पोशाक पहने दिखीं, पर अधिकतर आधुनिक पोशाक ही पहने थीं. कुछ सुंदर बच्चे भी थे, पर हर जगह पिछड़ापन नजर आता था, छोटे-छोटे घर तथा खेती के सहारे अपना गुजर बसर करने वाले यहाँ के लोग आधुनिक दुनिया से पूरी तरह कटे हुए प्रतीत होते हैं. नाश्ता करके हम वापसी की यात्रा पर निकल पड़े, नये वर्ष का प्रथम दिन होने के कारण MIAO Zoo तथा तिब्बतियों का कारपेट सेंटर बंद था. वापसी में जागून होते हुए हम दुलियाजान वापस आये, सहयात्री परिवार के घर स्वादिष्ट भोजन का आनन्द लिया और इस तरह हमारी छोटी सी यात्रा सम्पन्न हुई.

3 टिप्‍पणियां:

  1. बढिया यात्रा, वैसे जहाँ तिब्बतियन कल्चर के लोग रहते हैं वहाँ कुट्टु की खेती की जाती है।

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