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बुधवार, सितंबर 6

कृष्ण रंग में डूबा अंतर



कृष्ण रंग में डूबा अंतर 

श्याम रंग में भीगा अंतर
भीगी मन की धानी चूनर,
कोरा जिसको कर डाला था
विरह नीर में डुबो डुबोकर !

जन्मों से था जो सूखा सा
जैसे कोई मरुथल बंजर,
कैसे हरा-भरा खिलता है
कृष्ण रंग में डूबा अंतर !

एक डगर थी सूनी जिस पर
पनघट नजर नहीं आता था,
काँटों में उलझा था दामन
श्यामल रंग से न नाता था !

भर पिचकारी तन पे मारी
सप्त रंगी सी पड़ी फुहार,
 पोर-पोर शीतल हो झूमा
फगुनाई की बहती  बयार !

रंग दिया किस रंग में आज 
कान्हा रंग रसिया ह्रदय का,
राधा रंग गई, मीरा भी 
हुआ सुवासित कण-कण तन का !



रविवार, जून 29

खोल पंख नव इतराता है

खोल पंख नव इतराता है


मुक्त हुआ मन खो जाता है
अब वह हाथ कहाँ आता है,
अनथक जो वाचाल बना था
अब चुपचुप सा मुस्काता है !

प्रियतम का जो पता पा गया
अनजाने का संग भा गया,
छू आया अंतिम सीमा जो
खोल पंख नव इतराता है !

भांवर डाली जिसने पी संग
चूनर कोरी दी श्यामल रंग,
किसकी राह तके अब बैठा
गीत मिलन क्षण-क्षण गाता है !

सुधियाँ भी अब कहाँ सताती
चाह दूजे की नहीं रुलाती,
एक लहर उठती मन सागर
बस इक वही नजर आता है !

स्वप्न खो गये दूर गगन में
 उड़ी कल्पना कहीं पवन में,
 विकसित सरसिज एक अनोखा
उर उपवन को महकाता है !