कृष्ण रंग में डूबा अंतर
श्याम रंग में भीगा अंतर
भीगी मन की धानी चूनर,
कोरा जिसको कर डाला था
विरह नीर में डुबो डुबोकर !
जन्मों से था जो सूखा सा
जैसे कोई मरुथल बंजर,
कैसे हरा-भरा खिलता है
कृष्ण रंग में डूबा अंतर !
एक डगर थी सूनी जिस पर
पनघट नजर नहीं आता था,
काँटों में उलझा था दामन
श्यामल रंग से न नाता था !
भर पिचकारी तन पे मारी
सप्त रंगी सी पड़ी फुहार,
पोर-पोर शीतल हो झूमा
फगुनाई की बहती बयार !
रंग दिया किस रंग में आज
कान्हा रंग रसिया ह्रदय का,
राधा रंग गई, मीरा भी
हुआ सुवासित कण-कण तन का !
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