गुरुवार, दिसंबर 4

विश्व विकलांग दिवस पर



मृणाल ज्योति – एक आश्वास

दुलियाजान, कुमुद नगर स्थित गैर सरकारी संस्था मृणाल ज्योति आज एक चिर परिचित नाम है, जो पिछले पन्द्रह वर्षों से विशेष बच्चों की सहायता में जीजान से संलग्न है. इस समय यहाँ के स्कूल में एक सौ चालीस बच्चे पढ़ते हैं. जिनमें से सतासी छात्र तथा चौसठ छात्राएँ हैं. यहाँ मानसिक रूप से अविकसित विद्यार्थियों की संख्या छियासठ है तथा सुनने-बोलने में बाधित उन्नीस बच्चे हैं. चार छात्र ऐसे हैं जिन्हें शारीरिक व मानसिक दोनों प्रकार की बाध्यता है. सतावन सेरीब्रल पालसी से बाधित हैं.  चार ऑटिस्टिक हैं   तथा एक  लोकोमोटर बाध्यता से ग्रस्त है. इन सभी प्रकार के बच्चों के पूर्ण विकास के लिए हर सम्भव प्रयास किया जाता है. उन्हें रोजमर्रा के कार्यों के योग्य बनाया जाता है. उन्हें स्वच्छता तथा सामान्य व्यवहार की शिक्षा दी जाती है. कला तथा नृत्य के माध्यम से उनमें आत्मविश्वास जागृत किया जाता है. विभिन्न हुनर सिखाकर उन्हें भविष्य में आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा दी जाती है. यहाँ कक्षा आठ तक की शिक्षा का प्रबंध भी है. जो बच्चे सामान्य स्कूल में जाने के योग्य हो जाते हैं उन्हें स्थानांतरित कर दिया जाता है. अठारह वर्ष तक उन्हें यहाँ रखा जा सकता है, इसके बाद वे यदि चाहें तो कुछ वर्ष और भी रुक सकते हैं. माता-पिता का सहयोग मिले तो ये बच्चे भविष्य में अपना रोजगार भी शुरू कर सकते हैं और किसी हद तक एक सम्मानजनक सामान्य जीवन जी सकते हैं. किन्तु देखा गया है जब इस स्कूल में सीख कर बच्चे अपना दैनिक क्रियाकलाप करने योग्य हो जाते हैं तो माता-पिता उन्हें स्कूल भेजना बंद ही कर देते हैं और कुछ ही दिनों में बच्चे सीखा हुआ भी भूल जाते हैं और पुनः उसी स्थिति में पहुंच जाते हैं जहाँ वे पहले-पहल आए थे. इसलिए मृणाल ज्योति ने समय-समय पर माता-पिताओं को भी प्रशिक्षण देना आरम्भ किया है.
बदलते हुए समय के साथ आज समाज में इनके जैसे व्यक्तियों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता. यदि इन्हें अपने अधिकारों से रूबरू कराया जाये और सम्मानजनक जीवन जीने के अवसर प्रदान किये जाएँ तो ये बच्चे भी बहुत कुछ कर के दिखा सकते हैं. देखा जाये तो कमी किस इन्सान में नहीं है. समाज में कितने ही व्यक्ति ऐसे हैं जो शारीरिक व मानसिक रूप से पूरे सक्षम हैं पर समाज पर बोझ हैं, यदि वे किसी नशे की आदत के शिकार हैं या अपराधी प्रवृत्ति के हैं. जबकि ये बच्चे यदि इन्हें विशेष शिक्षा दी जाये समय पर उचित सहायता दी जाये तो राष्ट्र के विकास में अपनी भूमिका निभा सकते हैं. यह सही है कि समाज से विकलांगता को पूरी तरह मिटाया तो नहीं जा सकता पर इसे अभिशाप समझने की मानसिकता से बचा अवश्य जा सकता है. किसी भी कीमत पर इन्हें हीन भावना का शिकार नहीं होने देना है. प्यार और स्नेह से इन्हें सींचना है और बदले में इनके प्रेम को महसूस करना है. हर तरह से प्रोत्साहित करना है न कि इन्हें उपहास का पात्र समझना है. शारीरिक अक्षमता का यह अर्थ नहीं कि कोई मानसिक रूप से भी अक्षम है, इनमें भी भावनाएं हैं. इन्हें भी बराबरी से जीने का हक है.

सरकार ने भी ऐसे बच्चों के लिए कई योजनाये बनायी हैं. समान अवसर देना, अधिकारों की रक्षा करना और पूर्ण सहभागिता विकलांग व्यक्ति अधिनियम के अंतर्गत आते हैं. समय-समय पर सरकार द्वारा सहायक उपकरण प्रदान किये जाते हैं, छात्र वृत्तियाँ और पुरस्कार प्रदान किये जाते हैं. शासकीय नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था भी है. समाज का कर्त्तव्य है कि इनमें आत्मविश्वास जगाकर आत्मनिर्भर बनाने में मदद करे और सामान्य जीवन जीने का जज्बा पैदा करे. मृणाल ज्योति संस्था इनके पुनर्वास के लिए अनथक काम कर रही है और भविष्य में भी करती रहेगी.      

2 टिप्‍पणियां:

  1. सच्ची पूजा तो यही है - मानवता की सेवा और विश्व कल्याण की कामना.!

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  2. स्वागत व आभार प्रतिभा जी !

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