मंगलवार, मार्च 24

हे !

हे !

तू ही जाने तेरी महिमा
मौन हुआ मन झलक ही पाकर,
छायी मधु ऋतु खोया पतझड़
अब न लौटेगा जो जाकर !

रुनझुन गुनगुन गूँजे प्रतिपल
बरस रही ज्योत्स्ना अविरत,
पग-पग ज्योति कलश बिखेरे
स्रोत अखंड अमी का प्रतिपल !

द्वार खुला है एक अनोखा
पार है जिसके मन्दिर तेरा,
हिमशिखरों सा चमचम चमके
आठ पहर ही रहे सवेरा !

टिमटिम दिपदिप उड्गण हो ज्यों
श्वेत पुष्प झर झर झरते हैं,
रूप हजारों तू धरता है
सौन्दर्य, रंग भरते हैं !

राज न कोई जाने तेरा
तुझ संग मिलना न हो पाए,
देख तुझे 'मैं' खो जाता है
'तू' ही बस तुझसे मिल पाए !


7 टिप्‍पणियां:

  1. सतीश जी, व अमृता जी, स्वागत व आभार !

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  2. उस रहस्य का ठिकाना किसे मिला है. सुन्दर कविता.

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  3. स्वागत व आभार निहार जी

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  4. तू-तू करता तू भया ,मुझ में रही न हूँ ,
    वारी फेरी बलि गई ,जित देखूँ तित तूँ.
    - कबीर.

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