गुरुवार, मार्च 12

झर जाते फिर जैसे सपने

झर जाते फिर जैसे सपने



है अनोखा खेल उसका,  गूँज प्यारी पंछियों की
तिर रहे जो नील नभ में, कूक मनहर कोकिलों की !

सुन सकें तो हैं मधुरतम
कण-कण में जो बसे हुए,
दादुर, मोर, पपीहा के स्वर  
मेघ नीर भी सुर में बरसे !

टिप-टिप छन-छन बरसे बादल
पवन जरा हौले से बहती,
पीले पत्तों को शाखों से
लाकर भूमि पर धर देती !

छिप जाते पंछी डालों में
भीगे पंख झाड़ते अपने,
फूल सहा करते बूंदों को
झर जाते फिर जैसे सपने !

सृष्टि की लीला यह अनुपम
युगों-युगों से चली आ रही,
प्रेम भरे कातर नयनों को
उसी अलख की झलक दिखाती !


3 टिप्‍पणियां:

  1. अनुपम कृति , उस अलख की झलक दिख रही है ..

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  2. बहुत खूब,बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी ...बेह्तरीन अभिव्यक्ति ...!!शुभकामनायें.

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  3. अमृता जी व मदन जी, स्वागत व आभार !

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