सोमवार, दिसंबर 14

ये नन्हे श्रमिक



ये नन्हे श्रमिक

एक आवाज पर मालिक की दौड़े आते
पुरानी मटमैली जैकेट में तन को ढांपते
मुंह में जाने क्या चबाते
 ये बच्चे
अभी से बड़े हो गये हैं
साहब का थैला गाड़ी तक पहुंचाते
फिर से दुकान पर आकर खड़े हो गये हैं
आँखों में चमक अभी शेष है
 फुर्सत के क्षणों में हंसते और खेलते भी होंगे
पर जाने कब वे पल आते हैं
अभी तो ढोते रहना है बोझा
और ढाबे पर जाकर बुझानी है क्षुधा
चाय और टोस्ट से अपने आप ही
माँ के हाथों से खाना.. इनके नसीब में नहीं


7 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" मंगलवार 15 दिसम्बर 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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    1. बहुत बहुत आभार दिग्विजय जी

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  2. मर्मस्पर्शी प्रस्तुति
    बहुत सुन्दर ... बधाई !

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  3. संजय जी, आशा जी व नितिन जी स्वागत व आभार !

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  4. bahut hi sensitive kavita hai 'ye nanhe shramik '..apko bahut abhar aise subject par kavita likhne ke liye ...aur logo tak message pahuchane ke liye.Dhanyawad
    matrimony

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