गुरुवार, दिसंबर 17

राहों में जो फूल मिलेंगे

राहों में जो फूल मिलेंगे


मंजिल कितनी दूर भले हो
कदमों को न थकने देना,
राहों में जो फूल मिलेंगे
उर सुरभि से भरने देना !

पत्थर भी साथी बन सकते
चलना जिसको आ जाता है,
भूलों से ही उपजी पीड़ा
दुःख भी पाठ पढ़ा जाता है !

अंतर में जब प्रीत जगी हो
उपवन बन जाता संसार,
नहीं विरोध किसी से रहता
सहज बिखरता जाता प्यार !

श्रम के कितने सीकर बहते
नित नूतन यहाँ सृजन घटे,
साध न पूरी होगी जब तक
तिल भर भी न तमस घटे !

उर आंगन में रचें स्वर्ग जब
उसका ही प्रतिफलन हो बाहर,
भीतर घटे पूर्णिमा पहले
चाँद उगेगा नीले अम्बर !



4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शुक्रवार 18 दिसम्बर 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. पत्थर भी साथी बन सकते
    चलना जिसको आ जाता है,
    भूलों से ही उपजी पीड़ा
    दुःख भी पाठ पढ़ा जाता है !
    ... बहुत सुन्दर....

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