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सोमवार, जुलाई 13

मौन

मौन 


देह करे अवशोषण भोजन का

इतना ही तो पर्याप्त नहीं 

हर विचार, भावना और हर अनुभव को 

आत्मसात करे मन भी !

जीना है हर पल को शिद्दत से 

न रहे कोई कटु स्मृति 

न भीतर रह जाये 

कोई अधपका विचार  

संतुलन ही वह अग्नि है 

जो भीतर जगानी है 

देह और श्वास हों जब संतुलित

प्राण बहते हैं भीतर अबाधित 

साहस जगता है वैसे ही 

जैसे रात के बाद दिन 

संतुलन केवल मौन नहीं है 

वहाँ प्राणों की धारा बहती है 

और ह्रदय ज्ञान से जगमगा उठता है !


 

मंगलवार, जून 1

ऐसे ही घट-घट में नटवर

ऐसे ही घट-घट में नटवर

अग्नि काष्ठ में, नीर अनिल में 

प्रस्तर में मूरत इक सुंदर, 

सुरभि पुष्प में रंग गगन में 

ऐसे ही घट-घट में नटवर !


नर्तन कहाँ पृथक नर्तक से 

हरीतिमा नंदन कानन से, 

बसी चाँदनी राकापति में 

ईश्वरत्व भी छुपा जगत में !


दीप की लौ में जो बसा है 

वह प्रकाश चहुँ ओर बिखरता, 

प्रेम, शांति, आनंद की ज्योति 

उस से पाकर जगत सँवरता !


अनुभूति उसी मनभावन की 

अंतर में विश्वास जगाती, 

है कोई अपनों से अपना 

शुभ स्मृति पल-पल राह दिखाती !


जगत की सत्ता जगतपति से 

जिस दिन भीतर राज खुलेगा, 

एक स्वप्न सा है प्रपंच यह 

बरबस ही उर यही कहेगा !

 

बुधवार, अगस्त 26

ज्योतिर्मय वह स्रोत ज्योति का

ज्योतिर्मय वह स्रोत ज्योति का

 

रवि सौर मंडल की आत्मा  

आदित्य से हर रूप सजता,

सर्वप्रेरक, विश्व प्रकाशक 

सप्तवर्णी, नेत्र शंकर का !

 

सूर्य देव हैं स्रोत अग्नि के 

जीवन दाता वसुंधरा के, 

द्युलोक में गमनशील हैं 

नयनों में बसते प्राणी के !

 

अंधकार की काली छाया 

छँट जाती सविता प्रकाश में, 

पल भर में जो दृश्य बदल दे 

दिवसेश्वर नित आकाश के !

 

अग्नि देह को जीवित रखती 

वसुधा को भी गतिमय रखती, 

बड़वानल सागर में रहकर 

वैश्वानर जीव में बसती !

 

महाभूत है महादेव का 

ज्योतिर्मय वह स्रोत ज्योति का, 

तपस से ऋषिगण सृष्टि करते 

प्रलय तीव्र ज्वाल से घटता !

 

अग्नि शिखा नित ऊपर बढ़ती 

मार्ग प्रशस्त करे मानव का, 

पावक परम पावन शक्ति है

नष्ट करे हर दोष सभी का ! 

सोमवार, मार्च 9

होली

होली

रंग भरे जीवन में जिसने 
हर इक पल उसकी होली है, 
संशय सभी जला डाले फिर
हर करवट हँसी ठिठोली है !

मन मतवाला भूल भी जाय 
कुदरत ले निकली टोली है, 
रंगों की भाषा जो जाने 
हर कदम जहाँ रंगोली है !

नीला अम्बर, रवि नारंगी 
मेघ सलेटी, पंछी श्वेत,
हरी घास पर पीली मैना 
रक्तिम पुष्प, सुनहरे खेत !

अग्नि की पीली ज्वाला में
बैर भाव सबके जल जाएँ, 
उर की गहराई में सोया 
शुभ आह्लाद पुनः जग जाये !

बुधवार, मई 23

अंतर अभीप्सा

अंतर अभीप्सा

आकाश शुभ्र है
शुभ्र हैं हिमालय के शिखर
है अग्नि पावन
और पावन है मानसरोवर का जल
आत्मशक्ति उठना चाहती है गगन की ओर
अग्नि की भांति
बढ़ना चाहती है उर्ध्व दिशा में ही
बुझा देता है शिखा, मन
बन जलधार
ढक लेती ज्योति को
बुद्धि बन दीवार
उसे कभी प्रकाशित नहीं होने देती
इच्छाओं और वासनाओं की कालिमा
मोह-माया का छाजन
अभिव्यक्त नहीं होने देता
सुलगती रहती है भीतर ही भीतर
उसकी आंच जलाती भी है
झांकता है जब कोई भीतर
बुलाती है अपनी ओर उसकी पुकार
पर शीतलता के उपाय भीरु हृदय
तलाशता है बाहर ही बाहर
कभी वृक्षों की शीतल छाँह
कभी शीतल जल के स्रोत
अतृप्त रहे जाती तृष्णा
बल्कि बढ़ती ही जाती है
और जीवन की शाम हो जाती है
तब मृत्यु का अधंकार
उसे लील जाता है एक दिन..
फिर वही क्रम आरम्भ हो जाता है
जब तक नहीं जलती भीतर की
परम ज्योति प्रखर होकर
नहीं मिटती जलन अंतर की..
जब तक नहीं महकता आत्मा का फूल भीतर
नहीं मिलता सुख का स्पर्श कोमल !


बुधवार, जून 21

दोराहे हर मोड़ खड़े हैं




दोराहे हर मोड़ खड़े हैं



कहीं प्रज्ज्वलित अग्नि शिखा सी
कहीं धुँए से ढकी सुलगती,
कहीं सुगंधित अनिल बह रही
कहीं घुटन से फिजां रुँधी सी !

जीवन मिले बिछाय बिसातें 
चाहे जिस पाले में जाएँ,
पल-पल चुनना स्वयं को यहाँ
किसे सहेजें किसे लुटाएं !

दोराहे हर मोड़ खड़े हैं
निज हाथों में ही गेंद सदा,
हों स्वतंत्र हर दांवपेंच में
काटेंगे खुद का ही बोया !

एक ही नियम एक सदुपाय
जागे-जागे कदम बढ़े हर,
सूत्र यही इस खेल का सहज
यही बहे बन विजय का सुस्वर !

मंगलवार, अप्रैल 5

प्रकाश की एक धारा


प्रकाश की एक धारा

प्रकाश की एक धारा
अनवरत साथ बहती है
भले नजर न आये सरस्वती सी
गहराई की थाह नहीं जिसकी
और शीतल इतनी कि गोद में उसकी
अग्नि भी विश्राम पाती है !
उठती लहरें अन्तरिक्ष तक ऊंची
छलक जातीं बूंदें जहाँ-जहाँ
बन जाती वह भूमि यज्ञ शाला
आचमन करने वाला उर
तृप्त हो जाता
उसके सिवा कुछ भी जिसे
 छू भी नहीं पाता
पावन वह धारा
अजस्र भीतर रहती है !
प्रकाश की एक धारा
अनवरत साथ बहती है ! 

रविवार, जनवरी 11

उसने कहा था

उसने कहा था


जानते हो
 क्यों भला-भला लगता है ?
निरभ्र..विस्तीर्ण गगन
निस्सीम, निस्तब्धता छू जाती है
अंतर आकाश को
जैसे कोई दो बिछुड़े मित्र मिलकर
प्रसन्न हो जाएँ !

गंगा की लहरों से खेलना
युगों से लुभाता रहा है क्यों हमें ?
सागर की उत्ताल लहरों का स्पर्श
कर जाता है रोमांचित
क्योंकि नाच उठता है
भीतर का जल तत्व उसके साथ
उन पलों में होकर एकाकार !

अग्नितत्व भी हो जाता है तरंगित
निहार उठती हुई लपटों को
थिरक उठते हैं कदम तभी
होलिकादहन और लोहरी के उत्सवों में !

हो जाता होगा तन्मय वायुतत्व भी
सहला जाता है जब हवा का झोंका हौले से
और.... भला-भला लगता है माटी का स्पर्श
क्यों कुम्हार को ?
किसान घंटो गुजारता है उसके अंग-संग
उनके भीतर की माटी भी लेती है कोई आकार
पंच तत्वों से बने मानव
उन्हीं से जुड़कर होते हैं
वास्तव में आनंदित, प्रफ्फुलित !


मंगलवार, जुलाई 16

अग्नि एक संकल्प की जगे

अग्नि एक संकल्प की जगे




जाना है दूर अति सुदूर
पावों में पड़ी हैं बेड़ियाँ ,
कांटे बिखरे कदम-कदम पर
पुकारतीं किन्तु रण भेरियां !

एक युद्ध लड़ा जाना है
यात्रा इक आमन्त्रण देती,
आरोहण उच्च आकांक्षा का
ज्योति एक निमन्त्रण देती !

एक लक्ष्य साधना है पावन
‘कुछ’ तो अनावृत करना है,
नन्हे-नन्हे स्फुलिंगों से  
मन का अंधकार भरना है !

चमकीले रंगो वाले कुछ
जगत अनोखे कहीं छिपे हैं,
आओ उनको ढूँढ़ निकालें
छाया जिनकी यहीं कहीं है !

 दस्यु छिपे हैं अंधकार में
छिप कर वार किया करते,
निर्मल मन के शीतल जल में
विष की धार भरा करते !

अग्नि एक संकल्प की जगे
ज्योति प्रखर रोशन सब कर दे
एक ऊष्मा अमर प्रेम की
प्रज्ज्वलित कण-कण नभ तक कर दे


शनिवार, नवंबर 5

मन पानी, आत्मा अग्नि



मन पानी, आत्मा अग्नि

छल-छल कल-कल करता जल जो
गति नीचे कर बहता जाता,
ऐसे ही यह मन मानव का,
जल सम नीचे ही ले जाता !

सर-सर, फर-फर करे अनल ज्यों
ऊपर की ही दौड़ लगाती,
सजग हुई आत्मा अपनी
उच्च लोक में ही ले जाती !

जल, अग्नि के निकट हुआ जब
वाष्प रूप में बुद्धि प्रकटी,
जब तक साथ आत्मा का है
गति ऊपर, फिर नीचे आती !

ऊपर नीचे, नीचे ऊपर
मन ही मानव को भटकाता,
कभी बूंद बन लगे बरसने
कभी मेघ बन नभ पर छाता !

अग्नि सम यदि स्वयं को जाने
गति ऊपर की ही होगी उसकी,
पावन है पावन कर सकती
अग्नि में है अनुपम शक्ति !

भटका जल पोखर हो बैठा
कभी किसी सँग मिल के मैला,
जिसका सँग हो वैसे बनता
जल है कोई बिगड़ा छैला !

अग्नि पारस सी पावन है
माना प्यास बुझाता है जल,
अग्नि के सम्पर्क में आ ही
शुद्ध हुआ करता है जल !