मंगलवार, मई 17

अभी

अभी

अभी खुली हैं आँखें
तक रही हैं अनंत आकाश को
अभी जुम्बिश है हाथों में
 लिख रही है कलम प्रकाश को
अभी करीब है खुदा
पद चाप सुनाई देती है
अभी धड़कता है दिल
उसकी झंकार खनखनाती है
अभी शुक्रगुजार है सांसें
भीगी हुईं सुकून की बौछार से
अभी ताजा हैं अहसास की कतरें
डुबाती हुई सीं असीम शांति में
अभी फुर्सत है जमाने भर की
बस लुटाना है जो बरस रहा है
अभी मुद्दत है उस पार जाने में
बस गुनगुनाना है जो छलक रहा है  



(वर्तमान के एक क्षण में अनंत छुपा है) 

12 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 18 मई 2016 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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    1. स्वागत व बहुत बहुत आभार यशोदा जी !

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  2. सही है - एक क्षण का होना असीम-अनन्त का परिचायक है .

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    1. स्वागत व आभार प्रतिभा जी !

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  3. आज की बुलेटिन विश्व दूरसंचार दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है। सादर ... अभिनन्दन।।

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    1. स्वागत व बहुत बहुत आभार हर्षवर्धन जी !

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  4. उत्तर
    1. स्वागत व आभार सुशील जी !

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  5. 💥💥"नवीनतम करेंट अफेयर्स और नौकरी अपडेट के लिए इस ब्लॉग पर विजिट करते रहें।"💥💥

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  6. अभी फुर्सत है जमाने भर की
    बस लुटाना है जो बरस रहा है
    ...बहुत प्रभावी और विचारणीय अभिव्यक्ति...आभार

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  7. अभी जुम्बिश है हाथों में
    लिख रही है कलम प्रकाश को
    ------------------------------------ शानदार रचना !

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