मंगलवार, जुलाई 16

सदगुरु हरता अंधकार है


गुरु पूर्णिमा के शुभ अवसर पर 
सदगुरु को समर्पित


जैसे शिल्पी काट-छांट कर, पत्थर इक तराश देता है
सदगुरु राग-द्वेष मिटाकर, अंतर में प्रकाश देता  है !

माली बन हृदय को सींचे, अदा अनोखी अद्भुत उसकी
परमेश्वर से सदा जुड़ा वह, प्रकटाता उसकी अमल ज्योति !

बिखर गयीं जो मनस शक्तियाँ, एकीकृत कर धार भरे वह
केंद्रित हो जाता जब मन तो, सहज आत्मिक दुलार भरे वह !

सदगुरु हरता अंधकार है, ज्ञान उजाले में ले जाता
पथ ही नहीं दिखाता जग में, पथ पर हमराही बन जाता !

जीवन है यदि एक वाटिका, सदगुरु उसमें खिला कमल है
भ्रमरों से सब गुनगुन करते, भीतर जगता गीत विमल है !

लोहा शिष्य स्वर्ण हो जाये, पारस सा वह रहे अमानी
उसके होने भर से होता, सुदृष्टि देता ऐसा ज्ञानी !

साक्षात है शांति रूप वह, शास्त्र झरा करता शब्दों से 
सब करके भी रहे अकर्ता, परम झलकता है नयनों से !

जो भी व्यर्थ खले है मन में, अर्पित उन चरणों पर कर दें
ज्यों पावक में पावन होता, स्वर्णिम मन अंतर को कर दे !

सहज हो रहें जैसे है वह, उतार मुखौटे त्याग उपाधि
जग खुद ही हमसे पायेगा, जीवन में घटे सहज समाधि !

ईश्वर से कम कुछ भी जग में, पाने योग्य नहीं है कहता
उसी एक को पहले पालो, सदगुरु दोनों हाथ लुटाता !

राम नाम की लूट मची है, निशदिन उसकी हाट सजी है
झोली भर-भर लायें हम घर, उसको कोई कमी नहीं  है !

जग में होकर नहीं यहाँ है, सोये जागे वह तो रब में
उसके भीतर ज्योति जली है, देखे वह सबके अंतर में !

भीतर सबके परम ज्योति है, ऊपर पड़े आवरण भारी,
सेवा, सत्संग, शुभ साधना, उन्हें हटाने की तैयारी !

मल, विक्षेप, आवरण मन के, बाधा हैं सभी प्रभु मिलन में
सदगुरू ऐसी डाले दृष्टि, जल जाते हैं बस इक क्षण में !

भीतर का संगीत जगाता, भूल गयी निज याद दिलाता
जन्मों का जो सफर चल रहा, उसकी मंजिल पर ले जाता !

ऐसा परम स्नेही न दूजा, सदा गुरू का द्वार खुला है
बिगड़ी जन्मों की संवारें, ऐसा अवसर आज मिला है !  
  

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