शुक्रवार, अगस्त 6

मौन समर्पण



मौन 


प्रकाश कहा नहीं जाता 

अंधकार की कहे कौन ?

असीम शब्दों में नहीं समाता 

अच्छा है रहें मौन 

 मुखर जब मौन होगा 

सुवास बन खुद बहेगा 

चकित हुआ मन जहाँ 

मधु रस में पगेगा 



समर्पण 


हो समर्पित उर उन्हीं चरणों पे ऐसे 

धूलि जिनकी करे पावन 

बन सके फिर मन यह दर्पण 

 झलक जाए जग यह सारा 

पर छू न पाए एक कण भी 

तैरता इक जल के ऊपर 

हो अछूता कमल जैसे 

हो समर्पित उर किन्हीं कदमों में ऐसे 

मार्ग पाए चल पड़े फिर 

भूलकर सारी व्यथाएँ 

एक ही पथ चुन ले राही 

 कदम फिर उस पर बढ़ा दे  

इक तने पर खड़ा है वट 

अनगिनत शाखाएँ धारे 


14 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शनिवार (07-08-2021) को "नदी तुम बहती चलो" (चर्चा अंक- 4149) पर होगी। चर्चा में आप सादर आमंत्रित हैं।
    धन्यवाद सहित।

    "मीना भारद्वाज"

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  2. एक ही पथ चुन ले राही

    कदम फिर उस पर बढ़ा दे
    सुंदर प्रस्तुति आदरणीय , बहुत बधाइयाँ ।

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  3. आप सभी सुधीजनों का हृदय से स्वागत व आभार !

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  4. समर्पण के मार्ग में ही सुख है ...
    परम आनंद है ... सुन्दर अभिव्यक्ति ...

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