सोमवार, मार्च 21

एक हँसी भीतर जागी थी

एक हँसी भीतर जागी थी 

 

नयन टिके हैं सूने पथ पर 

किसकी राह तके जाता मन,

खोल द्वार दरवाजे बैठा

किसकी आस किये जाता मन !

 

एक पाहुना आया था कल

एक हँसी भीतर जागी थी,

हुई लुप्त फिर घट सूना है

फिर से इक मन्नत माँगी थी !

 

हर आहट पर चिहुँक ताकता 

किसकी बाट जोहता हर पल,

किसकी याद सँजोये बैठा

किसकी चाह किये जाता मन !

 

मिला बहुत पर नहीं वह मिला

बन बसंत जो साथ सदा हो,

स्वप्न नहीं बहलाते, ढूढें  

शीतल सुरमय  मधुर राग हो  !

 

किसको यह आवाज लगाये

किसकी नजरों को तरसे मन, 

फीका जग का हर रस लगता 

किसकी प्यास भरे जाता मन !


10 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (22-3-22) को "कविता को अब तुम्हीं बाँधना" (चर्चा अंक 4376 )पर भी होगी।आप भी सादर आमंत्रित है..आप की उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी .
    --
    कामिनी सिन्हा

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  2. बहुत सुंदर सृजन ,भाव और शब्द दोनों गहरे उतरते से।

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  3. भावभीनी ह्रदयस्पर्शी कविता ।
    पढ़ कर आत्मीयता-सी अनुभव हुई ।
    अभिनंदन, अनीता जी ।

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  4. मन को छूती बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति।
    सादर

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  5. ओंकार जी, नूपुर जी व अनीता जी आप सभी का स्वागत व हृदय से आभार!

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