बुधवार, मार्च 23

तेरी निष्ठुर करुणा भी

तेरी निष्ठुर करुणा भी 


कामना की अगन भीषण
जल रहा दिन-रात अंतर,
हृदय अकुलाया भटकता 
शोक से व्याकुल हुआ उर  !

तू दृढ़ अंकुश बन आया 
 ताप से मुझको बचाने, 
तेरी निष्ठुर करुणा भी 
बसी जीवन औ' मरण में !

दिए तन-मन प्राण,वसुधा   
 नील अम्बर बिना माँगे, 
तृप्त उर कुछ भी न चाहे 
मिटे लालसा शुभ जागे  !

कभी थक अलसाए नैन 
कभी अधजगा सा  चलता, 
एक खोज में लगा हुआ  
तेरे पथ  बढ़ता जाता !

लिए ओट तू छिप जाता 
राज यह मैंने जाना , 
पूर्व मिलन से योग्य बनूँ 
मक़सद तेरा पहचाना !


(गीतांजलि से प्रेरित पंक्तियाँ)

18 टिप्‍पणियां:

  1. वाह अनीता जी, शानदार कविता...लिए ओट तू छिप जाता
    राज यह मैंने जाना ,
    पूर्व मिलन से योग्य बनूँ
    मक़सद तेरा पहचाना !...और वो भी गीतांजलि से प्रेरित ..वाह

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    1. त्वरित और सुंदर प्रोत्साहन के लिए आभार अलकनंदा जी

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  2. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर गुरुवार 24 मार्च 2022 को लिंक की जाएगी ....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

    !

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  3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 24-3-22 को चर्चा मंच पर चर्चा - 4379 में दिया जाएगा| चर्चा मंच पर आपकी उपस्थिति सभी चर्चाकारों की हौसला अफजाई करेगी

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  4. अन्तर्मन को छूती प्रेरणादाई रचना ।

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  5. अंतर्मन स्पर्श करती अनुपम कृति । गहन चिन्तन से उपजी लाजवाब अभिव्यक्ति ।

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  6. तू दृढ़ अंकुश बन आया
    ताप से मुझको बचाने,
    तेरी निष्ठुर करुणा भी
    बसी जीवन औ' मरण में !


    अद्भुत सृजन अनीता जी,सादर नमन

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  7. लिए ओट तू छिप जाता
    राज यह मैंने जाना ,
    पूर्व मिलन से योग्य बनूँ
    मक़सद तेरा पहचाना !
    वाह…!

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  8. शुभा जी, मीना जी, कामिनी जी, सरिता जी व उषा किरण जी आप सभी का हृदय से स्वागत व आभार !

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