आकाश
एक वही अनंत आकाश
झरता है जिसमें से परम प्रकाश
वही आश्रय है हमारा
उपजे उसी से
उसी में समा जाएँगे
कुछ पल डोलेंगे यहाँ
इंद्रधनुष की तरह
देखते-देखते विलीन हो जाएँगे !
सागर
एक वही गहरा सागर
उसमें उठी एक लहर हैं हम
कुछ घड़ी सिर पटकेगी फिर
लौट जाएगी
उसी की गहराई में
सो जाएगी !
चेतना
एक वही परम चेतना
उधार लेकर थोड़ी सी
बन गये हैं हम ‘मन’
थोड़ी देर सोचेगा, समझेगा
सीखेगा, सिखायेगा
फिर उसी में खो जाएगा !
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