शनिवार, सितंबर 19

वही वही

आकाश 


एक वही अनंत आकाश 

 झरता है जिसमें से परम प्रकाश 

वही आश्रय है हमारा 

उपजे उसी से 

उसी में समा जाएँगे 

कुछ पल डोलेंगे यहाँ 

इंद्रधनुष की तरह 

देखते-देखते विलीन हो जाएँगे !


सागर 


एक वही गहरा सागर 

उसमें उठी एक लहर हैं हम 

कुछ घड़ी सिर पटकेगी फिर 

लौट जाएगी 

उसी की गहराई में 

सो जाएगी !


चेतना 


एक वही परम चेतना  

उधार लेकर थोड़ी सी 

बन गये हैं हम ‘मन’

थोड़ी देर सोचेगा, समझेगा 

सीखेगा, सिखायेगा 

फिर उसी में खो जाएगा !



कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें