एक गीत
झूठे-झूठे सपने, झूठे-झूठे वादे
मन ख़ुद से करता है
सच्ची-सच्ची बातों, सच की राहों
से शायद डरता है !
सच की ज्योति जली जो भीतर
उससे आँखें फेरे,
सपनों की इक नदी बह रही
बरबस जिसमें तैरे
झूठे-झूठे रस्तों पर ले जाता
जन्मों से आदत है,
सच का फूल खिला है भीतर
करता न चाहत है !
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