दूर कोई गा रहा है
कौन जाने आस
किसकी
किस बहाने आँख
ठिठकी
प्रीत की गागर
बना दिल
बेवजह छलका रहा
है !
चढ़ हवाओं के परों
पर
अनुगूँज मुड़ जाती
किधर
कौन उस पर कान
देगा
सुर मधुर बिखरा
रहा है !
बद्ध लय ना टूटती
है
अनवरत बहती नदी
है
मिल गयी निज
लक्ष्य से जब
मौन अब बस छा रहा
है !
(अभी-अभी दूर बैठे एक पक्षी की आवाज खिड़की से भीतर आ रही थी, फिर अचानक बंद हो गयी.)

