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बुधवार, मार्च 27

दूर कोई गा रहा है





दूर कोई गा रहा है

कौन जाने आस किसकी
किस बहाने आँख ठिठकी 
प्रीत की गागर बना दिल

बेवजह छलका रहा है !

चढ़ हवाओं के परों पर
अनुगूँज मुड़ जाती किधर
कौन उस पर कान देगा

सुर मधुर बिखरा रहा है !

बद्ध लय ना टूटती है
अनवरत बहती नदी है
मिल गयी निज लक्ष्य से जब

मौन अब बस छा रहा है !



(अभी-अभी दूर बैठे एक पक्षी की आवाज खिड़की से भीतर आ रही थी, फिर अचानक बंद हो गयी.) 

गुरुवार, फ़रवरी 26

वह हँसी

वह हँसी


परमात्मा सबसे बड़ा विदूषक है
वह जिसे कहते हैं न हंसोड़ !
उसने पट्टी बाँध दी है आँखों पर
और छोड़ दिया है स्वयं को खोजने के काम में
कभी कोई खोल देता है आवरण
तो खिलखिला कर हँस देता है
व्यर्थ के जंजाल से उबर कर
 वही चैन की नींद सोता है

छ्न्न से फूट पडती है हँसी
जब स्वप्न से जग जाता है कोई रात आधी
हमीं थे जो खुद को दौड़ाए जा रहे थे
शेर बनकर खुद को खाए जा रहे थे
और दिन में जो स्वप्न बुने चले जाता है कोई
टूटें...तब भी ऐसा ही हँस देना होगा
जानता है जो... वही असल में जीता है